हिन्दुस्तान स्मार्ट पड़ताल: जानें कैसे 'आपदा' के साथ 'अवसर' लेकर आया कोरोना

Smart News Team, Last updated: 24/07/2020 09:58 AM IST
  • कोविड संक्रमण के बाद लॉकडाउन हुआ तो व्यापार खत्म हो गए। धीरे-धीरे अनलॉक होने लगा, मगर तमाम कारोबार अब तक ठप पड़े हैं। मजदूर लौटेंगे नहीं, इसलिए फैक्ट्रियों का खुलना फिलहाल संभव नहीं है। ऐसे में आमदनी अठन्नी नहीं और खर्चा रुपया वाली स्थिति आ गई। लिहाजा हिम्मत हारने से भी कुछ नहीं होने वाला। ऐसे मानसिकता वाले कर्मवीरों ने समय के मुताबिक व्यापार बदल लिए।
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वर्षों की मेहनत से खड़े किए कारोबार ठप हो गए। होटल, फैक्ट्री, शोरूम, दुकानों में ताले लग गए। मजदूर पलायन कर गए। महीनों तक करने को कुछ नहीं था। जमा पूंजी निपटने लगी थी। 'आपदा' के ऐसे दौर में कुछ बिरलों ने 'अवसर' खोज लिए। अधिकतर ने कोविड से 'रिश्ते' वाले व्यवसायों में हाथ डाल दिए। इरादे मजबूत थे और मेहनत का साथ, लिहाजा काम भी चल निकले। अब उनकी गाड़ी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है।

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कोविड संक्रमण के बाद लॉकडाउन हुआ तो व्यापार खत्म हो गए। धीरे-धीरे अनलॉक होने लगा, मगर तमाम कारोबार अब तक ठप पड़े हैं। मजदूर लौटेंगे नहीं, इसलिए फैक्ट्रियों का खुलना फिलहाल संभव नहीं है। ऐसे में आमदनी अठन्नी नहीं और खर्चा रुपया वाली स्थिति आ गई। लिहाजा हिम्मत हारने से भी कुछ नहीं होने वाला। ऐसे मानसिकता वाले कर्मवीरों ने समय के मुताबिक व्यापार बदल लिए। संक्रमण से बचाव के साधनों को बनाना और लगाना शुरू करके वे 'आपदा में अवसर' के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर बन गए हैं। इनसे इतर कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने कुछ अलग शुरू किया। उन्होंने 'आत्मनिर्भर' वाले नारे को सिद्ध कर दिया है। इनका ध्येय वाक्य कर्म है। इन्हीं 'कर्मवीरों' के लिए समर्पित है यह विशेष रिपोर्ट...।

सैकड़ों ने बदले पुराने काम

पुश्तैनी या पुराने कारोबार बंद होने पर कई लोगों ने दूसरे क्षेत्रों में स्विचओवर कर लिया है। हालांकि नए क्षेत्रों की बहुत कम लोगों को जानकारी है। बाकी सभी ने एक तरह से जुआ खेला है। लेकिन इनकी दूरदर्शिता, मेहनत की बदौलत काम चलने लगे हैं।

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कर्मवीरों की कहानी

1. फुटवियर मंदा पड़ा, बनाने लगे सेनेटाइजर टनल

नाम है अक्षत नागिया। काम था फुटवियर कंपोनेंट। आगरा के सभी एक्सपोर्ट हाउस को माल सप्लाई करते थे। कोविड शुरू होते ही भविष्य की आशंकाओं का आंकलन करते हुए 'कोरोना' से ही कमाने की ठान ली। अनुभव नहीं था लेकिन सेनेटाइजेशन की टनल बनाने का काम शुरू किया। इसके लिए इंटरनेट का सहारा लिया। एक-दो जगह टनल लगाईं तो काम मिलने लगा। इसके बाद लाइन लग गई। रोमसंस, आर्मी एयरबोन, एयरफोर्स पैराट्रुपर अकादमी, डीसेंट फुटवियर, वर्सेटाइल ऑपरेशंस, राजविजय कॉर्पोरेशन, आगरा विवि, स्पर्श मल्होत्रा अस्पताल जैसे 40 स्थानों पर टनल लगाई हैं। कमाई का साधन मिला तो पलायन कर रहे मजदूरों के लिए खाने का प्रबंध किया। पहले तीन लोग साथ में काम करते थे। अब छह लोगों को रोजगार मिल गया है।

- कैसी भी परिस्थिति हो, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। बाजार में क्या चीज चल रही है, उसका ख्याल करते हुए काम करना चाहिए। अनुभव काम करने से आता है। घर से बाहर निकलना ही है, तो काम क्यों न किया जाए। ध्यान रहे, कोई भी काम छोटा नहीं होता।

अक्षत नागिया, एनएन लेदर स्टोर।

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2. चांदी का काम छोड़ लगा रहे वेंटीलेटर

अंजय सुराना चांदी कारोबारी हैं। श्री साईं कृपा ऑर्नामेंट्स के नाम से सप्लाई महाराष्ट्र में थी। महाराष्ट्र कोविड के सबसे प्रभावित राज्यों में से एक है। नतीजा कारोबार ठप हो गया। इन्होंने कोविड में ही कमाई का जरिया खोज निकाला। उन्होंने जान लिया कि कोविड काल में सबसे अधिक जरूरत अस्पतालों और वेंटीलेटर्स की पड़ने वाली है। आगरा में इसकी बेहद कमी है। उन्होंने यूनाइटेड किंगडम में वेंटीलेटर, आईसीयू मॉनीटर और ऑक्सीजन कॉन्सन्ट्रेटर बनाने वाली कंपनियों से संपर्क किया। यहां उन अस्पतालों को टटोला, जहां वेंटीलेटर नहीं थे। लॉकडाउन में यूके से आयात करके 30 यूनिट वेंटीलेटर लगाए हैं। इतने ही आर्डर प्रतीक्षा में हैं। हालांकि अब भारतीय वेंटीलेटरों की मांग बढ़ गई है। अब वह भारतीय कंपनियों का सामान लगा रहे हैं।

- चांदी का काम पुराना है लेकिन अभी चल नहीं रहा है। काम महाराष्ट्र पर निर्भर था। उसे पटरी पर आने में समय लगेगा। तब तक के लिए यह काम खोल लिया। आखिर परिवार के लिए जरूरत के खर्चे निकालने ही पड़ेंगे। घर बैठे तो खाया नहीं जाएगा।

अंजय सुराना, चांदी कारोबारी।

3. 23 साल पुराना एंपोरियम बंद, अब डेली नीड्स

पर्यटन क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है किरन कुमार विमल उर्फ कुक्की भाई। फतेहाबाद रोड पर अच्छे-खासे एंपोरियम थे। हर्बल, चाय, मसाले, कॉस्मेटिक जैसे दूसरे काम भी थे। सब पर्यटन के सहारे चल रहा था। इस सेक्टर पर ताले लगने के बाद कारोबार बंद करना पड़ा। बंद दुकान का 20 हजार रुपये बिजली का बिल आया। ऐसे में उसी स्थान पर 'विमल्स डेली नीड्स स्टोर' के नाम से काम खोल लिया। किराने से लेकर हर तरह का सामान भर लिया है। दिक्कत यह कि बिक्री रफ्तार नहीं पकड़ पाई है और सभी सामान की एक्सपायरी डेट कम होती है। सामान जल्दी नहीं बिका तो खराब होने का खतरा है। ऐसे हुआ तो 80 प्रतिशत का नुकसान झेलना पड़ सकता है। यानि खतरा यहां भी कम नहीं है। हालांकि यह कुछ न करने से तो बेहतर है।

- 23 साल तक हमने अपने पुराने काम की बदौलत घर-परिवार चलाया। बच्चे पालकर बड़े किए। इस काम से दिली जुड़ाव हो चला था। कोविड के कारण एक झटके में काम बंद करना पड़ा। जो कुछ बचा था, नए काम में लगा दिया है लेकिन हिम्मत नहीं हारी है।

कुक्की भाई, ग्रॉसरीज कारोबारी।

4. हैंडीक्राफ्ट कारोबार खत्म, अब खिला रहे खाना

अनुज गायत्री का फतेहाबाद रोड पर रतन हैंडीक्राफ्ट के नाम से एंपोरियम था। पर्यटक आते-जाते रहते थे तो घर की गाड़ी भी ठीक चल रही थी। पुराने काम का फायदा मिलता था। कोविड आने के बाद से हालात बिगड़ गए। अब चार महीने से न पर्यटक हैं और न एंपोरियम का ताला खुला। विदेशी पर्यटकों की आमद इस साल के अंत तक संभव नहीं है। उसी जगह पर अब रेस्टोरेंट खोल लिया है। कोविड काल में महंगा खाना चुनिंदा लोग ही खाएंगे। लिहाजा 'दिल्ली वाला' के नाम से रेस्टोरेंट चल निकला है। हैंडीक्राफ्ट के शोरूम में आधा दर्जन लोग काम करते थे। यहां भी इतना ही स्टाफ है। आपदा काल में भी वह अपने साथ छह लोगों के लिए रोजगार का कारण बने हैं। खुद आत्मनिर्भर बनकर दूसरों को रोजगार देने वाले ही कर्मवीर कहलाते हैं।

-घर बैठने या नौकरी तलाशने का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में खुद ही कुछ करना होगा। यही सोचकर लाइन बदल ली है। अनुभव नहीं था लेकिन धीरे-धीरे सीख रहे हैं। बस इरादा नेक होना चाहिए, फिर समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाती हैं।

अनुज गायत्री, संचालक 'दिल्ली वाला'।

5. सूट सिलना बंद, अब बुटीक पर बना रहीं मास्क

मंजू माहेश्वरी जिस बुटीक में डिजायनर कपड़ों को आकार देती थीं, अब वहां मास्क सिले जाते हैं। इंजीनियर कॉलोनी में अन्नापूर्णा डिजायनर बुटीक अब कपड़े के मास्क के लिए जाना जाता है। कोविड से पहले यहां महिलाओं की आवाजाही लगी रहती थी। संक्रमण फैलने के बाद बुटीक की रौनक गायब हो गई। परिवार चलाना था। सिलाई के अलावा कुछ कर नहीं सकती थीं। ऐसे में उन्होंने इसी सिलाई की दिशा बदल दी। सूट और कुर्ती की बजाए मास्क बनाने का फैसला लिया। इंटरनेट और पत्रिकाओं में मास्क बनाने के तरीके सीखे। कॉटन के मास्क बनाने का काम चल निकला। उन्होंने डॉक्टरों के लिए 200 मास्क जीवनी मंडी स्वास्थ्य केंद्र की प्रभारी डॉ. मेघना शर्मा को दिए। हालांकि अब उनका बुटीक पटरी पर लौट रहा है। लेकिन मास्क बनाना बंद नहीं किया है।

-उनके पास ग्राहकों के फोन आते हैं। बुटीक के बारे में पूछते हैं। अभी तक उन्हें निराशा होती थी। अब बुटीक भी खोल लिया है। मास्क भी बना रही हूं। लॉकडाउन में मास्क बनाए, बेचे भी और दान भी किए। इस कमाई से अधिक दिली खुशी मिली है।

मंजू माहेश्वरी, अन्नपूर्णा बुटीक।

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