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आगरा: वे गुमनाम कोरोना योद्धा, जिन्होंने संकट काल में बिना थके निभाई अपनी भूमिका

Smart News Team, Last updated: 09/06/2020 02:16 PM IST
  • कोरोना वायरस संकट के बीच अपने देश के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मियों को कोरोना योद्धा कहा है, मगर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कोरोना काल में योद्धा की भांति दिन-राट जुटे हुए हैं। ये कोरोना योद्धा हैं, रेलवे के गुड्स ड्राइवर और गार्ड।
मालगाड़ी की प्रतीकात्मक तस्वीर

कोरोना काल में एसेंशियल सर्विसेज (आवश्यक सेवा) के लिए काम करने वाले सभी लोगों को कोरोना योद्धा कहा जा रहा है। कोरोना वायरस संकट के बीच अपने देश के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मियों को कोरोना योद्धा कहा है, मगर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कोरोना काल में योद्धा की भांति दिन-राट जुटे हुए हैं। ये कोरोना योद्धा हैं, रेलवे के गुड्स ड्राइवर और गार्ड। दरअसल, रेलवे के गुड्स ड्राइवर व गार्ड पूरे लॉकडाउन में अपनी ट्रेनों से देशभर में जरूरी सामान पहुंचाने में दिन-रात जुटे रहे। बिना शिकायत और साजो-सामान के ड्राइवर और गार्डों ने देश के करोड़ों लोगों को विषम परिस्थिति में किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी।

दरअसल, 24 मार्च की आधी रात यानी कोरोना लॉकडाउन के ऐलान के बाद से ट्रेनों का परिचालन बंद हो गया था। मगर सबकी नजरों से दूर आगरा कैंट पर तैनात गुड्स ट्रेनों के ड्राइवर, असिस्टेंट ड्राइवर व गार्ड जरूरी काम को अंजाम देने में जुट गए थे। लगभग 250 रनिंग स्टाफ आगरा कैंट से गुजर रहीं मालगाड़ियों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभा रहा थे।

इस बाबत लोको निरीक्षक हरिओम भारद्वाज ने कहा, 'लॉकडाउन में यात्री ट्रेन भले ही बंद हो गईं थीं, मगर मालगाड़ी व विशेष पार्सल गाड़ी लगातार चल रही थीं। मालगाड़ियों में गरीबों के राशन का चावल व गेहूं सहित रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजें शामिल थीं।'

देशभर में पहुंचाया राशन

वहीं, रेलवे का कहना है कि लॉकडाउन में केन्द्र सरकार ने राशनकार्डधारकों को मुफ्त अनाज देने के आदेश दिए थे। आदेश के बाद पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों से राशन का चावल व गेहूं कई हजार टन मालगाड़ियों में लादकर देश के विभिन्न राज्यों में भेजा। इसके अलावा विशेष पार्सल ट्रेनों से भी व्यापारियों ने जरूरी सामान भेजा।

तीन दिन में एक बार ड्यूटी

लॉकडाउन में जहां मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों के रनिंग स्टाफ अपनी ड्यूटी के लिए घर पर बैठ इंतजार कर रहे थे, वहीं गुड्स ट्रेन के स्टाफ को हर दिन तीन दिन पर ड्यूटी पर आना पड़्ता था। मास्क, सैनिटाइजर, थर्मल स्क्रीनिंग के बाद जब स्टाफ ट्रेन के सफर के लिए रवाना होता था, तो चेहरे पर लोगों को जरूरी सामान पहुंचाने का संतोष भी नजर आता था।

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