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आगरा के कोरोना योद्धाओं को हिन्दुस्तान का सलाम: बेहोश होकर भी कम नहीं हुआ जज्बा

Smart News Team, Last updated: 10/06/2020 07:30 PM IST
  • आगरा के एसएन मेडिकल कालेज के आइसोलेशन वार्ड में कोरोना वॉरियर्स अपनी सेहत की चिंता को छोड़कर पूरे मन से कोविड मरीजों की देखबाल में लगे हैं।
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में कोरोना वॉरियर्स अपनी सेहत की चिंता किए बिना कोविड 19 मरीजों की सेवा में हर समय जुटे हैं।

आगरा. कोरोना काल में कोरोना वॉरियर्स बिना किसी तनाव लिए खुद की सेहत की चिंता छोड़कर अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ लोगों की जान बचाने में लगे हैं. ऐसा ही नजारा एसएन मेडिकल कालेज के आइसोलेशन वार्ड में देखने को मिल रहा है जहां ड्यूटी दे रहे डाक्टर, नर्स, वार्ड ब्वाय हो या सफाई कर्मचारी अपनी सेहत की चिंता छोड़कर पूरे मन से लोगों की सेवा में लगे हैं। बीते दिनों में अपने फर्ज को अंजाम देते हुए एक, दो नहीं, तीन कर्मचारी बेहोश होकर गिर पड़े।

आगरा के 45 डिग्री सेल्सियस तापमान में पीपीई किट में उनका दम घुटने लगा। मास्क लगा था, इसलिए सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी। यहां एयर कंडीशनर नहीं हैं। कूलर भी नहीं हैं। सिर्फ पंखों के सहारे गर्मी काटी जा रही है। ऐसे में तीन योद्धा ज्यादा समय तक रणभूमि में टिक नहीं पाए। लड़ते-लड़ते गिर पड़े। शुक्र है कि भूतल पर कंट्रोल रूम में मॉनिटर लगा है।

सीसीटीवी से हर वार्ड का नजारा देखा जा सकता है। योद्धाओं के बेहोश होते ही साथी डाक्टर और कर्मचारी दौड़ पड़े। उन्हें उठाकर लाए और ड्रिप लगाई गई। ग्लूकोज और तत्काल राहत देने वाली दवाएं दी गईं। तब कहीं इनकी सांस नियमित कर पाए। यानि दूसरों की जान बचाने वाले रोज अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे किस्से रोज होते हैं, आइसोलेशन की दीवारों में कैद होकर रह जाते हैं। कोई कुछ बताता भी नहीं है। बाहर सिर्फ ठीक होकर मुस्कुराते हुए मरीजों के चेहरे दिखाई देते हैं। योद्धाओं का संघर्ष किसी को दिखाई नहीं देता।

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खुले स्थान में आकर लेते हैं सांस

पहली और दूसरी मंजिल पर आइसोलेशन में ड्यूटी दे रहे डाक्टर और कर्मचारियों की तबीयत रोज खराब हो रही है। वे जल्दी किट नहीं उतार सकते। लिहाजा बीच में मौका मिलते ही खुले स्थान में आ जाते हैं। कुछ देर सांस जुटाने के बाद फिर वार्डों में चले जाते हैं। लेकिन यह हर रोज नहीं हो पाता। कभी ओटी में केस लग जाता है। कभी किसी मरीज की तबीयत बिगड़ती है तो स्पीकरों पर उद्घोषणा सुनाई देती है। इसके बाद सभी एलर्ट मोड पर आ जाते हैं। उद्घोषक के निर्देशों के मुताबिक डाक्टर और स्टाफ दौड़ते रहते हैं।

मगर डटे हैं कोरोना योद्धा

डा. अखिल प्रताप सिंह, (जेआर) कहते हैं कि आगरा में तापमान बढ़ने से मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। अब किट पहनकर बमुश्किल आधा घंटा ही कट पाता है। इससे अधिक कोशिश करने पर दिक्कत शुरू हो जाती हैं। कम उम्र के डाक्टर और कर्मचारी झेल जाते हैं। लेकिन इच्छाशक्ति को बहुत मजबूत करना पड़ता है। लेकिन हर बार यह पूरा काम नहीं करती है। कभी-कभार हम हार भी जाते हैं। इस समय हमारे जीवन से भी अधिक अपने लोगों को बचाना है।

वहीं सपना राजपूत, स्टाफ नर्स (एसएनएमसी) बताती हैं कि गर्मी में किट पहनते ही डी-हाईड्रेशन शुरू हो जाता है। शरीर से पसीना निकलता है और पानी की कमी होने लगती है। ऐसे में आप किट नहीं निकाल सकते। वैसे तो आठ घंटे किट पहननी पड़ती है। लेकिन अब परिस्थिति के हिसाब से वरिष्ठ डाक्टरों और साथियों के साथ प्रबंधन कर रहे हैं। लोगों को बचाए रखने के साथ परिवार में सुरक्षित पहुंचने की फिक्र ही रहती है। यही जज्बा हमें काम करने की प्रेरणा देता है।

किट नहीं, हमें तो स्टाफ की चिंता

डा. एसके वर्मा, प्रमुख अधीक्षक (जिला अस्पताल) इस संबंध में कहते हैं कि सैंपल लेने वाले डाक्टर, तकनीशियन, नर्स, वार्ड ब्वाय, सफाई कर्मचारी, एंबुलेंस चालक सभी को किट पहननी पड़ती हैं। कितनी देर, यह कहना मुश्किल है। काम के दबाव के मुताबिक खुद को व्यवस्थित करना पड़ता है। इन्हें पहनकर काम करना बहुत मुश्किल है। जितना दिखता है उससे भी कहीं ज्यादा। इसीलिए हमने कह रखा है कि किट की चिंता न करें। जरा भी दिक्कत शुरू होते ही किट उतारकर बाहर आ जाएं।

एसएनएमसी के सफाई कर्मचारी गौरव बताते हैं कि पीपीई किट पहनकर आधा घंटे से अधिक काम करना मुश्किल है। लिहाजा हमें बहुत तेजी से काम करना होता है। आधा घंटे में जितना ज्यादा हो जाए, उतना ही ठीक रहता है। साफ-सफाई बार-बार करनी पड़ती है। नए मरीज आएं या पुराने बाहर जाएं, हर मूवमेंट पर डोपिंग की जाती है। सेनेटाइजेशन भी करना होता है। कुछ हिस्से में एसी लगे हैं लेकिन अधिकतर वार्डों में नहीं हैं। मगर ऐसे में काम तो करना ही है।

डा. साधना सिंह ने इस बारे में कहा कि कम से कम चार घंटे वे किट पहनते हैं। वैसे तो एक शिफ्ट के हिसाब से छह से आठ घंटे पहनना होता है। लेकिन यहां गर्मी बहुत है। किट पहनते ही हालत खराब होने लगते हैं। उनका काम गंभीर कोविड मरीजों को ऑक्सीजन, वेंटीलेटर और एनेस्थीसिया देना है। इसमें देर लगती है और गलती की गुंजाइश होने पर नुकसान का खतरा रहता है। लिहाजा हम काम को पूरा किए बगैर किट नहीं उतार सकते। कई लोग बेहोश हो जाते हैं। मगर लोगों की जान तो बचानी ही है।

 

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