आगरा

कोरोना लॉकडाउन में संकट ही संकट: 70 % कम हो गया रक्तदान, बैंकों में खून की कमी

Smart News Team, Last updated: 04/06/2020 08:05 PM IST
  • लॉकडाउन की वजह से आगरा शहर में करीब 70 फीसदी रक्तदान कम कम हो गया है। इतना ही नहीं, ब्लड बैंकों में खून की भी बडी़ किल्लत हो गई है।
प्रतीकात्मक तस्वीर

आगरा, मधु

कोरोना लॉकडाउन ने एक साथ कई मुसीबतों को जन्म दिया है। रोजगार, खाने-पीने से लेकर कई तरह की दिक्कतों को जन्म देने वाले कोरोना वायरस और लॉकडाउन ने एक नई तरह की समस्या खड़ी कर दी है। लॉकडाउन की वजह से आगरा शहर में करीब 70 फीसदी रक्तदान कम कम हो गया है। इतना ही नहीं, ब्लड बैंकों में खून की भी बडी़ किल्लत हो गई है।

दरअसल, आगरा में एक कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर के 11 साल के बेटे को छह माह की उम्र से ही थैलेसीमिया है। हर 20 दिन पर उसे ब्लड चढ़वाना होता है। अब तक प्रोफेसर को अपने बेटे के लिए खून के लिए खासा कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा, मगर अब लॉकडाउन के दौरान ब्लड की दिक्कत हो गई। प्रोफेसर का कहना है कि रक्तदाता को ले जाए बिना ब्लड बैंक या अस्पताल वाले ब्लड नहीं दे रहे हैं। बेटे को कुछ दिन पहले ब्लड चढ़वाया था। इसके लिए बड़ी मुश्किल से रक्तदाता मिला।

आगरा शहर में यह सिर्फ उन्हीं की दिक्कत नहीं है, बल्कि थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर, किडनी के मरीजों और गर्भवती महिलाएं भी इस परेशानी से जूझ रही हैं। इन बीमारी के मरीजों और गर्भवती महिलाओं को भी ब्लड बैंकों में खून नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह यह है कि रक्तदाता कोरोना वायरस के डर से अस्पताल जाकर रक्तदान करने को तैयार नहीं हो रहे हैं। लॉकडाउन में 70 प्रतिशत तक रक्तदान कम हुआ है। इससे डिलीवरी, प्लास्टिक एनीमिया, डायलिसिस, हीमोफीलिया के मरीज भी परेशान हैं।

शहर में थैलेसीमिया करीब एक हजार, ब्लड कैंसर के 257 और किडनी के करीब 1500 मरीज हैं। प्राइवेट अस्पतालों में ब्लड चढ़वाने के लिए कई जगहों से थैलेसीमिया के मरीज आते हैं। इन बीमारियों के मरीजों को 15 से 20 दिन में ब्लड चढ़वाना होता है। प्राइवेट अस्पताल वाले एक ब्लड यूनिट के लिए 1500 से 1900 रुपये वसूल रहे हैं। रक्तदाता साथ में लाने पर ही अस्पताल वाले ब्लड उपलब्ध करवा रहे हैं।

एसएन कॉलेज में भी नहीं लग रहे शिविर

एसएन मेडिकल कॉलेज की ब्लड बैंक की डॉ. नीतू चौहान ने कहा, 'अस्पताल में कुछ लोग स्वेच्छा से रक्तदान करते आते हैं। विभिन्न जगह लगने वाले शिविरों में भी ब्लड इकट्‌ठा किया जाता है। लॉकडाउन के कारण न तो रक्तदाता आ रहे हैं और न शिविर लगाए जा रहे हैं। फिलहाल 500-600 यूनिट का स्टॉक है। पहले 150-200 यूनिट रोज आता था। 100 से 150 यूनिट रोज की खपत थी। अब ब्लड नहीं आ रहे हैं, जबकि 50-60 यूनिट रोज खर्च हो रहे हैं। रक्तदाता लाने पर ही ब्लड दे रहे हैं। गायनिक विभाग में हमारे यहां रक्त बराबर रहता है। ट्रोमा में राहत है। रक्तदाताओं की कमी हुई है।'

हर महीने होती है 6000 यूनिट की जरूरत

वहीं, मानव सेवा चेरिटेबल संस्था के संस्थापक ओम प्रकाश चौधरी का कहना है 'प्रत्येक महीने शहर में 6000 यूनिट रक्त की जरूरत होती है। इसमें एक ब्लड बैंक के पास थैलेसीमिया के ही करीब 50 केस होते हैं। पांच से सात ब्लड बैंकों में ही थैलेसीमिया के मरीजों के लिए 500 से 1000 यूनिट ब्लड की आवश्यकता होती है। लोकहितम ब्लड बैंक के निदेशक अखिलेश अग्रवाल ने बताया कि लॉकडाउन में 30 से 35 प्रतिशत रक्तदान ही हो रहा है। पहले प्रतिदिन 60 से 65 यूनिट की सप्लाई होती थी। अब आठ से 10 यूनिट हो गयी है। हमारे पास प्लास्टिक एनीमिया और कैंसर, थैलेसीमिया के केस रजिस्टर्ड हैं। उनके लिए आवश्यकता होती है। पहले रक्तदान शिविर से काम आसान था। अब डोनर को बुलाना पड़ता है।'

हर महीने लगते थे 100 से अधिक रक्तदान शिविर

ब्लड बैंक संचालकों का कहना है कि पहले हर महीने 100 से अधिक रक्तदान शिविर लगते थे। अब यह कम हो गए हैं। विभिन्न संस्थाओं के अलावा लोग स्वेच्छा से भी रक्तदान करते थे। अब संकल्प सेवा समिति ने इसकी शुरुआत की है। मानव सेवा चेरिटेबल की ओर से रक्तदान बस संचालित की गई है। संचालकों का कहना है कि कई ऑपरेशन ऐसे थे, जो रक्त मिलने पर ही किए गए।

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