27 साल बाद जन्माष्टमी पर बनेगा ये संयोग, ऐसे करें श्रीकृष्ण को प्रसन्न

Anuradha Raj, Last updated: Fri, 27th Aug 2021, 9:32 AM IST
  • जन्माष्टमी का दिन श्रीकृष्ण को समर्पित होता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रीकृष्ण के एक स्वरुप का जन्म हुआ था. ऐसे में जो भी भक्त विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें भगवान श्रीकृष्ण मनवांछित फल देते हैं.
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

जन्माष्टमी के दिन ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था. हिंदू धर्म में इस पर्व को खूब धूम-धाम से मनाते हैं. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था. इस बार जन्माष्टमी के दिन बेहद ही विशेष संयोग बनने जा रहा है. ऐसा मौका 27 साल के बाद आया है. जब श्री कृष्ण जन्माष्टमी को 30 अगस्त को एक दिन ही मनाया जाएगा. 29 अगस्त की रात 11 बजकर 27 मिनट से भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि की शुरुआत हो जाएगी, जो 1 बजकर 59 मिनट तक 30 अगस्त को रहेगी. तो वहीं रोहिणी नक्षत्र की बात करें तो 6 बजक 38 मिनट से 30 अगस्त को 9 बजकर 43 मिनट तक रहने वाला है. हर साल ऐसा देखा गया है कि स्मार्त और वैष्णव अलग-अलग दिन जन्माष्टमी मनाते थें. इसके पीछे का ये कारण है कि स्मार्त वर्तमान तिथि को और वैष्णव उदयातिथि को जन्माष्टमी मनाया करते थे. 

ज्योतिषों का कहना है कि रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि एक साथ पड़ रहे हैं. जिसे जयंती योग के नाम से जाना जाता है. ऐसे में ये महासंयोग से बिलकुल भी कम नहीं है. भगवान श्रीकृष्ण का जब द्वापर योग में जन्म हुआ था, उसी दौरान ये जयंती योग पड़ा था. इस महासंयोग में जो भी व्रत रहेगा उसे मनवांछित फल की प्राप्ति होगी. इस दिन आप भगवान श्रीकृष्ण को खुश करने के लिए कई तरह के उपाय कर सकते हैं. इस दिन मिश्री, माखन, दूध, दही, मावे, केसर, मिठाई, घी इत्यादि से भोग लगाएं. साथ ही भगवान श्री कृष्ण की आरती करके आप उनको प्रसन्न कर सकते हैं. अगर आप श्रीकृष्ण को उनके पसंदीदा भोग लगाते हैं, और आरती करते हैं तो भगवान आप पर कृपा बरसाएंगे.

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला,

बजावै मुरली मधुर बाला ।

श्रवण में कुण्डल झलकाला,

नंद के आनंद नंदलाला ।

गगन सम अंग कांति काली,

राधिका चमक रही आली ।

लतन में ठाढ़े बनमाली

भ्रमर सी अलक,

कस्तूरी तिलक,

चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,

देवता दरसन को तरसैं ।

गगन सों सुमन रासि बरसै ।

बजे मुरचंग,

मधुर मिरदंग,

ग्वालिन संग,

अतुल रति गोप कुमारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

जहां ते प्रकट भई गंगा,

सकल मन हारिणि श्री गंगा ।

स्मरन ते होत मोह भंगा

बसी शिव सीस,

जटा के बीच,

हरै अघ कीच,

चरन छवि श्रीबनवारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,

बज रही वृंदावन बेनू ।

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

हंसत मृदु मंद,

चांदनी चंद,

कटत भव फंद,

टेर सुन दीन दुखारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

 

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