पितृ पक्ष के अंतिम दिन हजारों लोगों का 'तर्पण' करती हैं इंदौर की भाग्यश्री

ABHINAV AZAD, Last updated: Thu, 7th Oct 2021, 12:49 PM IST
  • इंदौर की रहने वाली भाग्यश्री कहती हैं कि उन्हें अपने दिवंगत गुरूजी से ऐसा करने की प्रेरणा मिली. साथ ही वह बताती हैं कि पिछले पांच सालों से ऐसा कर रही हैं.
(फोटो क्रेडिट- एएनआई)

इंदौर. भाग्यश्री नाम की एक महिला ने पितृ पक्ष के अंतिम दिन, उन लोगों का 'तर्पण' किया, जिनका उन्होंने कोरोना के समय से अंतिम संस्कार किया था. साथ ही भाग्यश्री ने पितृ पक्ष के अंतिम दिन, उन लोगों का भी 'तर्पण' किया, जिनका उन्होंने कोरोना संक्रमण से पहले अंतिम संस्कार किया था. इंदौर की रहने वाली भाग्यश्री कहती हैं कि उन्हें अपने दिवंगत गुरूजी से ऐसा करने की प्रेरणा मिली. साथ ही वह बताती हैं कि पिछले पांच सालों से ऐसा कर रही हैं.

बताते चलें कि इस वर्ष सर्व पितृ अमावस्या 6 अक्टूबर यानि बुधवार के दिन था. पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्व पितृ अमावस्या या पितृ विसर्जिनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है. हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक, हर वर्ष आश्विन मास की अमावस्या तिथि को ही सर्व पितृ अमावस्या होती है. दरअसल, हिंदू धर्म में सर्व पितृ अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व है. इसे महालया अमावस्‍या भी कहते हैं. सर्व पितृ अमावस्या के दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान किया जाता है, जिनके स्वर्गवास की तिथि मालूम नहीं होती है.

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ऐसी मान्यताएं हैं कि स दिन हम पृथ्वी लोक पर आए उन सभी पितरों को श्राद्ध कर्म से आत्म तृप्त करके पितृ लोक विदा करते हैं, इसलिए सर्व पितृ अमावस्या को पितृ विसर्जिनी अमावस्या कहते हैं. पितर तृप्त होकर अपनी संतानों के सुख, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देकर खुशी खुशी अपने लोक चले जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितर पूरे पितृ पक्ष में पृथ्वी लोक पर निवास करते हैं. उनको पितृ पक्ष में अपने वंश से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की आस रहती है. यदि वे तृप्त नहीं होते या उनका श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो वे नाराज हो सकते हैं. जिससे वे क्रोधित होकर वापस लौट जाते हैं और अपने वंश को श्राप भी दे सकते हैं.

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