700 साल पुराना यह गांव जहां दूल्हे की होती है विदाई, दुल्हन का घर बसाता है लड़का

Swati Gautam, Last updated: Sun, 7th Nov 2021, 10:59 AM IST
  • आज हम आपको माउंट आबू शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर एक गांव बसा जवाई गांव की कहानी बताने जा रहे हैं जहां शादी के बाद दुल्हन नहीं बल्कि दूल्हे की विदाई की जाती है और शादी के बाद दूल्हा दुल्हन के घर रहने लगता है. आइए जानें पूरी कहानी.
700 साल पुराना यह गांव जहां दूल्हे की होती है विदाई, दुल्हन का घर बसाता है लड़का. फाइल फोटो

कानपुर. दिवाली और छठ जैसे बड़े त्योहारों के बाद शादी का सीजन शुरू होता है ऐसे में हम आपको एक गांव की बड़ी रोचक और कहानी बताने जा रहे हैं जहां शादी के बाद दुल्हन नहीं बल्कि दूल्हे की विदाई की जाती है और शादी के बाद दूल्हा दुल्हन के घर रहकर उसका घर बसाता है. दरअसल यह कहानी माउंट आबू शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर एक गांव बसा जवाई गांव की है. यहां की लड़की से शादी कर उनके पति यहीं बसते हैं. इस गांव का इतिहास भी काफी रोचक है. यह गांव करीब 700 साल पुराना है एक बार एक लड़की से शादी के बाद उसके पति यहीं बस गए थे जिसके बड़ा से इस गांव का नाम जवाई पड़ गया.

ऐसे शुरू हुई परंपरा

जवाई गांव निवासी नारायण सिंह परमार ने इस गांव का इतिहास बताते हुए कहा कि हमारे पूर्वज बताते थे कि आज से करीब 700 साल पहले इस गांव में लड़कियां ज्यादा थीं, जिससे उनकी शादी में समस्या रहती थी. एक बार दो भाइयों जीवाजी और कान्हाजी ने इस गांव की दो बेटियों से शादी की. जीवाजी ने रंबा से शादी कर जवाई गांव को बसाया और दूसरे भाई कान्हाजी ने पवना से शादी कर जवाई गांव से 10 किलोमीटर दूर जंगल की ओर कनारी ढाणी को बसाया. जब से इस गांव का नाम जवाई पड़ गया.

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शाम में खुद बजती थीं मंदिर की घंटी

अक्सर लड़कियों के मन में यह बात आती है कि काश दूल्हा विदा होकर दुल्हन के घर आता. जवाई गांव इस काश को हकीकत में बदल देता है. जवाई गांव में दूल्हे के विदा होने की परंपरा एकदम हटके है. जवाई गांव में इस समय में 40 परिवार रहते हैं जो कि परमार राजपूत है. वहिंगांव की आददी कुछ 250 है. यह गांव इतना विकसित नहीं हुआ है इसलिए इसमें बसे परिवारों के कुछ लोग खेती, करी और गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं. इस गांव से जुड़ा एक और रोचक तथ्य है जवाई गांव से करीब 12 किलोमीटर दूर आजा माताजी का सबसे पुराना मंदिर. जो तकरीबन 1300 साल पुराना बताया जाता है. ऐसी मान्यता है कि शाम के समय मंदिर में घंटी बजती थी, तो एक साथ 99 झालर गूंज उठते थे.

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