कानपुर हैलट अस्पताल में दवा की किल्लत, मरीजों के इलाज पर संकट गहराया

Nawab Ali, Last updated: Mon, 11th Oct 2021, 3:47 PM IST
  • उत्तर प्रदेश के कानपुर में हैलट अस्पताल में दवाओं की किल्लत बरकार है. अस्पताल प्रशासन का आरोप है कि मेडिकल कॉरपोरेशन को परेशानियों से पत्र लिखकर अवगत करा चुके हैं लेकिन दवाओं की पूर्ती नहीं हो पा रही है.
kकानपुर हैलट अस्पताल में दवाओं की भारी किल्लत. फाइल फोटो

कानपुर. उत्तर प्रदेश के कानपुर हैलट अस्पताल में दवाओं का संकट खड़ा हो गया है. दवाओं के संकट के कारण मरीजों के इलाज तमाम परेशानियां खड़ी हो गई हैं. अस्पताल में इंजेक्शन पैरासिटामाल, डेक्सामेथासोन और एडवांस एंटीबायोटिक समेत 60 दवाओं की भारी किल्लत अस्पताल प्रशासन का कहना है कि कई बार पत्र लिखकर व अन्य माध्यम से मेडिकल कॉरपोरेशन को अवगत कराया गया है लेकिन अफसरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं. मेडिकल कॉरपोरेशन से अस्पताल प्रशासन ने 60 दवाएं मांगी थी लेकिन मात्र सात दवाएं ही मिल पाई.

कानपुर में हैलट और संबद्ध अस्पताल में दवाओं की किल्लत बरकार है. यहां के अफसरों का कहना है कि कॉरपारेशन के पास वही दवाएं हैं जो सीएचसी और पीएचसी में इस्तेमाल होतीं या अधिक से अधिक ओपीडी में इस्तेमाल योग्य हैं. अस्पताल प्रशासन का कहना है कि यहां आने वाले मरीज कई जगह से रेफर होकर आते हैं जिस कारण जरुरी दवाओं की किल्लत के चलते इलाज में मुश्किल हो रही है. दवाओं की इतनी किल्लत है कि जो दवाएं भेजी गईं उनमें भी जिसे एक ग्राम इंजेक्शन मांगा गया था तो आधा ग्राम वाले इंजेक्शन भेज दिए गए. 1000 मिलीग्राम की जगह 500 मिलीग्राम की टेबलेट दी गई. 

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प्रमुख अधीक्षक प्रो. आरके मौर्या के मुताबिक कॉरपोरेशन को पत्र भेजते थक गए पर सुनवाई नहीं होती है। इतने बड़े अस्पताल में अब क्या होगा, दवाएं नहीं रहेंगी तो सीएचसी के भी खराब हालात हो जाएंगे. अधिकारियों का कहना है कि इमरजेंसी में मरीजों की भीड़ बढ़ गई जिस कारण बुखार के मरीजों की बड़ी संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. जिस कारण पैरासिटामाल इंजेक्शन की सबसे अधिक खपत है. इमरजेंसी में अक्सर मरीजों की संख्या 300 पार कर जाती है ऐसे में सभी मरीजों को कुछ दवाएं देनी हैं. बाहर से मंगवा नहीं सकते हैं. ऐसी हालत में मरीजों को कैसे मैनेज किया जाए, यह बड़ी समस्या बन गई है.

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प्राचार्य जीएसवीएम प्रो. संजय काला का कहना है कि अगर कॉरपोरेशन दवाएं नहीं भेज पा रहा तो इंतजार कब तक किया जा सकता है. गरीब मरीज दवाओं के लिए परेशान हैं. 85 लाख के आसपास बजट भी वहां फंसा है. पत्र भेजकर नियमों को शिथिल करने की मांग की गई है.

 

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