दशहरे पर यहां होती है रावण की पूजा, जानें कानपुर के इस मंदिर की खासियत

Smart News Team, Last updated: 25/10/2020 02:27 PM IST
  • कानपुर में रावण के मंदिर में आज विजयदशमी के मौके पर उसकी पूजा अर्चना की गई. ऐसी मान्यता है कि रावण का जन्म और मृत्यु एक ही दिन हुई थी. रावण के इस मंदिर में लोगों को विशेष आस्था है. सुबह से यहां भक्तों का तांता लगा है.
दशहरे के मौके पर रावण की पूजा करते भक्त

कानपुर: एक ओर जहां पूरे देश में विजयदशमी के मौके पर रावण का दहन किया जा रहा है. वहीं शहर के शिवाला स्थित कैलाश मंदिर परिसर में रविवार को विजय दशमी के दिन दशानन मंदिर में लंकेश की मूर्ति को गंगा जल व दूध से नहला-धुला कर उसकी पूजा अर्चना की गई. आज सूर्य की पहली किरण पड़ते ही रावण के दर्शन को मंदिर के पट खोल दिए. जिसके बाद लंकेश की आरती कर सरसों के तेल के दीपक जलाए गए. 

जानकारी के मुताबिक प्रयाग नारायण शिवाला बाजार से लगे मंदिर परिसर में सुबह से ही रावण के दर्शन को लोग जुटने लगे. दशहरे के मौके पर सूर्य की पहली किरण के साथ मंदिर के कपाट खुल गए. दशानन की मूर्ति को गंगाजल व दूध से स्नान कर वस्त्रों व फूलों से श्रृंगार किया गया. साथ ही मिठाई और फल का भोग लगाकर रावण की आरती उतारी गई. वैदिक मंत्रों के बीच सरसों के तेल के दीपक जलाए गए. आज रावण के दर्शन करने आए विश्वनाथ शुक्ला बोले कि रावण चारों वेदों का ज्ञाता व प्रकांड विद्वान था. उनका मानने है कि लंकेश के दर्शन से सकारात्मक ऊर्जा, बुद्धि व विवेक का लाभ होता है.

कानपुर में रावण के मंदिर में उसकी की पूजा अर्चना के बाद प्रतिमा

 

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आपको बता दें कि रावण के इस अनोखे मंदिर का निर्माण उन्नाव के रहने वाले गुरूप्रसाद शुक्ल ने 1868 को कराया था. वह रोज यहां मंदिर में पूजा अर्चना करने आते थे. यहां पर शिव का मंदिर था. मंदिर निर्माण के पीछे शिव के महाभक्त को उनके साथ विराजमान करना था. जिसके चलते गुरूप्रसाद शुक्ल ने 1868 में दशानन मंदिर का निर्माण कराया था. ऐसी मान्यता है कि रावण का जन्म व मृत्यु एक ही दिन हुआ था.  यहां पर साल में एक बार दशानन मंदिर के पट खुलते हैं। रावण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

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