कानपुर : जीएसवीएम के डॉक्टरों ने ढूंढा जन्माधंता का इलाज

Smart News Team, Last updated: 02/01/2021 11:04 AM IST
  • जन्म के समय जब नवजात के मस्तिष्क को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है तो ब्रेन इंजरी हो जाती है। इस कारण बच्चे की आंखों की रोशनी चली जाती है। तीन-चार माह बाद जब वह देख नहीं पाते है तो समस्या पता चलती है। जीएसवीएम कॉलेज के नेत्र रोग विभाग ने ऐसे बच्चों की ऑप्टिक नर्व को ठीक कर उन्हें रोशनी देने में कामयाबी हासिल की है।
फाइल फोटो

कानपुर :  जीएसवीएम कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष ने जन्मांधता का इलाज ढूंढ़ लिया है। जिन नवजातों में पैदा होते ही उनकी आंखों की रोशनी चली जाती है, उनको अब दोबारा रोशनी दी जा सकती है।

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष प्रो. परवेज खान ने बताया कि इन बच्चों में आंख से ब्रेन को जाने वाली ऑप्टिक नर्व में खून का संचार न होने से अंधता आती है। ऑप्टिक नर्व की स्थिति जानने के लिए हम लोगों ने विजुअल इवोक पोटेंशियल (वीईपी) टेस्ट करवाया। इसकी जांच रिपोर्ट में नर्व की एक्टिविटी शून्य मिली। ऐसे में नर्व में रक्त संचार बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार की दवा चलाई। छह-छह माह के अंतराल में जांच करवाई, जिसके बेहतर परिणाम मिले। इस तरह से दो साल के अध्ययन में एक बच्चे की अंधता को दूर करने में कामयाब मिली। डॉक्टर के मुताबिक इसी पैटर्न पर हैलट में और भी बच्चों का इलाज चल रहा है। जिनके उत्साहजनक परिणाम मिल रहे हैं।

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प्रोफेसर के मुताबिक जन्म के समय न रोने वाले नवजात को उलटा लटकाकर पीठ पर थपकी देकर रुलाया जाता है। न रोने से रक्त संचार बाधित होता है और ब्रेन में खून न पहुंचने से बच्चे दम तोड़ देते हैं। जो बच जाते हैं, उनके मस्तिष्क को ऑक्सीजन न मिलने से ब्रेन इंजरी हो जाती है। इससे आंखों की रोशनी चली जाती है। जन्म के तीन-चार माह बाद जब वह देख नहीं पाते है तो समस्या पता चलती है।  

 प्रो. परवेज खान ने बताया कि ऑक्सीजन की कमी से हुई अंधता का कोई इलाज नहीं था। इससे जुड़ी जांच भी यहां नहीं होती है। ऐसे बच्चों को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स दिल्ली) भेजा जाता था। दो वर्ष पहले चार नवजात आए तो अध्ययन शुरू किया। उन्हें खून का संचार बढ़ाने वाली दवाएं दीं। छोटे बच्चों को दवा का पाउडर बनाकर नियमित दिया गया। उसके बेहतर परिणाम मिले हैं। एक बच्चे के माता-पिता ने रोशनी लौटने की जानकारी दी तो वीईपी जांच कराई, जो सौ फीसद आई। तीन अन्य की रिपोर्ट पचास फीसद है। उनका अभी इलाज चल रहा है। इसे अध्ययन को इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित करवाने जा रहे हैं।  जन्म से अंधता की समस्या वाले चार बच्चे मेडिकल कॉलेज के हैलट अस्पताल के नेत्ररोग विभाग में इलाज के लिए वर्ष 2017-18 के बीच आए। उसमें तीन नवजात शहर के जबकि एक फतेहपुर जिले का है। दो नवजात बालरोग अस्पताल से सीधे आए, जबकि दो शहर के बड़े निजी अस्पताल से यहां रेफर होकर आए हैं।

 

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