बाबरी मस्जिद विध्वंस केस पर CBI कोर्ट का फैसला आज, जानें क्या है पूरा मामला

Smart News Team, Last updated: Wed, 30th Sep 2020, 10:50 AM IST
  • बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में आज CBI की विशेष आदालत फैसला सुनाएगी. लेकिन फैसले के साथ यह जानना भी जरूरी है कि इस केस की टाइमलाइन क्या रही है. कब क्या और कैसे हुआ जिसमें आज यह फैसला आ रहा है.
बाबरी मस्जिद विध्वंस केस पर CBI कोर्ट का फैसला आज, जानें क्या है पूरा मामला

लखनऊ. आज सीबीआई की विशेष अदालत अयोध्या के बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में फैसला सुनाएगी. ऐसे में इस केस का टाइमलाइन जानना जरूरी हो जाता है. इस मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती समेत कुल 32 लोग आरोपी हैं. यह फैसला 28 साल बाद आ रहा है. इस मामले में 17 आरोपी अब इस दुनिया में भी नहीं हैं. गौरतलब है कि बाबरी विध्वंस मामले में कुल 49 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. अब इतने सालों बाद सीबीआई की अदालत फैसला सुनाएगी. 

बाबरी मस्जिद विध्वंस केस का टाइमलाइन:- 

दरअसल इस विवाद और विवाद का परिणाम विध्वंस को जानने के लिए सबसे पहले 16वीं शताब्दी में चलना होगा. सन् 1528-29 में भारत में बाबर का शासन था. उसमें मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बनाई गई. कहा जाता है कि बाबर के सेनापति मीर बाकि ने मंदिर तोड़कर यहां मस्जिद बनवाई. इस मस्जिद को नाम दिया बाबरी मस्जिद. इसके तीन सदी बाद तक हमें बाबरी मस्जिद या उससे जुड़ी किसी तरह का कोई उल्लेख लिखित प्रमाणों में नहीं मिलता है. 

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फिर अंग्रेजों के आने के बाद 19वीं शताब्दी में 1853 में पहली बार अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम हिंसा की घटना का पता चलता है. कहा जाता है कि यह घटना अयोध्या के मुद्दे को लेकर हुई थी. हिंसा तब हुई जब निर्मोही अखाड़ा ने ढांचे पर दावा करते हुए कहा कि जिस जगह पर मस्जिद है वहां मंदिर हुआ करता था. दो सालों तक इस मुद्दे पर हिंसा चलते रहने पर 1859 में ब्रिटिश शासन ने इस परिसर हिंदू-मुस्लिमों को बांट दिया. इसके बाद 1885 में पहली बार यह मामला जिला अदालत पहुंचा. संतों ने परिसर में मंदिर बनाने की इजाजत मांगी, लेकिन मांग कोर्ट ने मांग ठुकरा दी.

अब यह विवाद 20वीं शताब्दी में प्रवेश कर चुका था. 1934 में फिर दंगे हुए. फिर 1949 में मस्जिद में राम की मूर्ति पाई गई. मामला एक बार फिर अदालत पहुंच गया. उधर सरकार ने उस जगह को विवादित घोषित कर वहां ताला लगा दिया. अब मामले में 1959 में निर्मोही अखाड़ा और दूसरी तरफ सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मस्जिद पर मालिकाना हक को केस किया.

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1984 में रामजन्मभूमि मुक्ति समिति का गठन किया गया. उधर गोरखपुर के गोरखनाथ धाम के महंत अवैद्यनाथ ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति बनाई. बाद में इस अभियान का नेतृत्व बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया. दो साल बाद 1986 में जिला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया. मुसलमानों ने विरोध किया और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाई.

1989 में मस्जिद से थोड़ी दूर विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर का शिलान्यास किया. वहीं विहिप नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मुकदमा किया. 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से यूपी के अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की. लेकिन 25 सितंबर 1990 को बिहार में लालू यादव ने रथ यात्रा रुकवा ली और आडवानी को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके विरोध में बीजेपी ने तब प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

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30 अक्टूबर 1990 में अयोध्या में पहली बार कारसेवा का हुई. लेकिन मुलायम यादव सरकार के गोली चलाने के आदेश के बाद इसमें पांच कारसेवकों की मौत हो गई. इससे विवाद और बढ़ गया. यूपी में 1991 में चुनाव हुए और अब बीजेपी की सरकार बनी. सीएम बने कल्याण सिंह.

बीजेपी शासित यूपी में 6 दिसंबर 1992 को एक बार फिर कोरसेवा की घोषणा हुई. नवंबर में यूपी सीएम कल्याण सिंह ने अदालत में मस्जिद की हिफाजत करने का हलफनामा दिया. इसके बाद 6 दिसंबर को हजारों की संख्या में कारसेवक पहुंचे और मस्जिद ढहा दिया. इससे पूरे देश में दंगे शुरू हो गए. इसमें हजारों की संख्या में लोग मारे गए.

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मस्जिद ढहाने की मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा व विष्णु हरि डालमिया पर धारा 120 बी यानी आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया. सभी के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 बी, 147, 149, 153ए, 153बी और 505 (1) के तहत मुकदमा चला. मामले में कुल 49 में से 32 अभियुक्तों के मुकदमे की कार्यवाही शुरू हुई. अब तक इस मामले में 17 अभियुक्तों की मौत हो चुकी है. और अब कुल 28 सालों बाद इसी मामले में आज फैसला आ रहा है.

 

 

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