जातीय सम्मेलन के भरोसे UP चुनाव जीतने की तैयारी में BJP, 200 जातियों पर फोकस

Indrajeet kumar, Last updated: Fri, 17th Dec 2021, 7:45 PM IST
  • उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव को देखते हुए भाजपा जातीय समीकरण साधने में जुट गई है. बीजेपी ने पूरे प्रदेश में पूरे प्रदेश में करीब 200 जातीय सम्मेलन करने का फैसला लिया है. इस सम्मेलन के जरिए भाजपा ओबीसी और दलित समुदाय खासकर कुर्मी, जाटव और निषाद जाति को साधने की कोशिश में है.
फोटो सोर्स : अमित शाह ट्विटर हैंडल

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 200 जातीय सम्मेलन करने का फैसला लिया है. इसी कड़ी में अमित शाह  खुद निषाद पार्टी के रैली में शामिल होने के लिए शुक्रवार लखनऊ पहुंचे. निषाद यानि मल्लाह समुदाय की आबादी प्रदेश के कुछ जिलों में अच्छी खासी है. इसलिए भाजपा अपने चुनावी रणनीति के हिसाब से इस रैली को अहम मान रही है. इस रैली से भाजपा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों की लामबंदी में जुट गई है. प्रदेश की कुल आबादी में निषाद समुदाय की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है. पूर्वांचल के कुछ जिलों खासकर गोरखपुर और देवरिया में इनकी अच्छी खासी आबादी है. माना जाता है कि सूबे के लगभग 1500 सीटों पर इनका प्रभाव है.

छोटी पार्टियों को साथ लेकर चलने की कोशिश

भाजपा ने इसी साल सितंबर में निषाद पार्टी से गठबंधन की घोषणा की थी. इसके अलावा अपना दल भी भाजपा के साथ ही है. अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल कुर्मी समुदाय से आतीं हैं. इस जाति की यूपी के कई जिलों अच्छी खासी आबादी है. भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल को 19 विधानसभा सीटें दी थीं. लेकिन सीटों के बंटवारा में समझौता ना होने के कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को करीब एक दर्जन से भी ज्यादा सीटों पर नुकसान का सामना कारण पड़ा. इसलिए भाजपा 2022 के विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरणों को साधने के लिए छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लेकर चल रही है. निषाद समुदाय को साथ लेकर भाजपा दलित समुदाय के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है.

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इन जातियों को साधकर होगी नुकसान की भरपाई

गौरतलब है कि आगामी विधान सभा चुनाव में भाजपा ने कुल 200 जातीय सम्मेलन करने का फैसला लिया है. इन सम्मेलनों में करीब 75 प्रतिशत सम्मेलन ओबीसी समुदाय के वोटरों को लुभाने के लिए किया जा रहा है. भाजपा इसे अपने राजनीतिक रणनीति के लिए अहम मान रही है क्योंकि 2014 से भाजपा को इसी समुदाय के वोटरों के समर्थन से ही सफलता मिल रही है. लेकिन इस बार किसान आंदोलन के कारण इन वोटरों की नाराज होने की आशंका है. इसलिए भाजपा इस बार निषाद, जाटव और कुर्मी बिरादरियों को साधने में जुटी है.

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