लखनऊ : पारंपरिक अनाज की खेती छोड़ स्ट्राबेरी उगा रहे हैं किसान

Smart News Team, Last updated: 18/01/2021 07:35 PM IST
  • पहले रबी और खरीफ की फसलों का उत्पादन किया जाता था, लेकिन पिछले साल से किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती करने का फैसला किया.स्ट्रॉबेरी की खेती उनके लिए फायदेमंद साबित हो रही है. वह स्ट्रॉबेरी को फल मंडी में बेचते हैं और उससे अच्छी आमदनी हो जाती है.
(प्रतिकात्मक फोटो)

लखनऊ- गोसाईगंज इलाके में कुछ किसानों ने अनाज की पारंपरिक खेती करने के अलावा व्यावसायिक खेती करना शुरू कर दिया है. हाल में गोसाईगंज और मोहनलालगंज में किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती की है जो उनके लिए फायदेमंद साबित हो रही है.सभी ब्लॉकों में एक से दो एकड़ जमीन पर किसान स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं.

सबसे पहले गोसाईगंज इलाके में कुछ किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू करी. कासिमपुर बिरुहा के किसान आलोक ने भी अपनी एक बीघा जमीन मे स्ट्रॉबेरी की खेती की है. पहले उन्होंने अपने ही खेत में पौधे लगाए ,लेकिन उनमें से कुछ ही पौधे कामयाब हुए. उन्होंने बताया कि अब उन पौधों पर फल आने लगे हैं. इसी गांव के रमेश ने भी तीन साल तक स्ट्रॉबेरी की खेती की थी. रमेश के मुताबिक वह स्ट्रॉबेरी को फल मंडी में बेचते थे और उससे अच्छी कमाई हो जाती थी.

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मोहनलालगंज के गोपालखेड़ा निवासी राजेश सिंह भंडारी कहते हैं कि पहले रबी और खरीफ की फसलों का उत्पादन किया जाता था, लेकिन पिछले साल से उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती करने का फैसला किया. राजेश ने बताया कि इस काम में उनके यूके से लौटे चचेरे भाई ने उनकी मदद की. राजेश ने बताया कि स्ट्रॉबेरी के पौधे पुणे, जलगांव व दिल्ली और दूसरे शहरों से मंगवाए जाते हैं. इसके लिए पहले से बुकिंग करानी पड़ती है.शुरुआत में इसके दाम अधिक होते हैं, लेकिन उत्पादन बढऩे के साथ ही दाम घटने लगते हैं. राजेश कहते हैं कि स्ट्रॉबेरी की खेती से बाकी खेती के मुक़ाबले अच्छी आमदनी हो जाती है. उद्यान एवं खाद्य एवं प्रसंस्करण के उप निदेशक वीरेंद्र यादव के मुताबिक, कई उन्नतशील किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की है. स्ट्रॉबेरी की खेती लगातार बढ़ने से बाजारों का भी विकास हो रहा है. सभी ब्लॉकों में एक से दो एकड़ जमीन पर किसान स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं. कुछ किसान अपनी स्ट्रॉबेरी की फसल को बाजारों में बेच रहे हैं तो कुछ खुद दुकानदारों से संपर्क कर के अपनी फसल बेच रहे हैं. बाजारों में ज़्यादा से ज़्यादा फसल बिकने पर इसका सीधा फायदा किसानों को ही मिलेगा, लेकिन अभी इसका कोई आंकड़ा नहीं है.

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