लॉकडाउन में को-वैक्सीन ट्रॉयल के लिए नहीं मिले थे बंदर: ICMR महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव

Haimendra Singh, Last updated: Mon, 22nd Nov 2021, 10:13 AM IST
  • आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने केजीएमयू के कार्यक्रम मे बताया है कि लॉकडाउन में को-वैक्सीन के ट्रॉयल करने के लिए बंदर नहीं मिल पाए थे जिससे काफी परेशानियां का सामना करना पड़ा था.
केजीएमयू के रिसर्च सेशन में शामिल हुए आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव.

लखनऊ. किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रिसर्च सेशन में शामिल होने के लिए लखनऊ आए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद(ICMR) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने बताया कि लॉकडाउन में स्वदेशी को-वैक्सीन ट्रॉयल के लिए बंदर नहीं मिल पाने से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था. इस परेशानी के कारण वैक्सीन के ट्रायल में देरी हुई थी. काफी मशक्कत के बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना के जंगलों से 20 बंदर पकड़कर लाए गए था जिसके बाद उनपर रिसर्च की गई.

कार्यक्रम में डॉ. भार्गव ने बताया कि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर पूरे देश में लॉकडाउन लगा था जिसके कारण लोगों को घरों में रहने की हिदायत दी गई. इससे इंसानों की बात तो दूर जानवर तक परेशान हो उठे. बंदरों के सामने खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया तो बंदर जंगलों की तरफ शिफ्ट हो गए. परेशानी तब हुई जब वैज्ञानिकों ने कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के लिए बंदरो को चुना. भारत के पास चीन से बंदर मंगाने का विकल्प था लेकिन हमने ऐसा नहीं किया. फिर जगलों से पकड़कर बंदरों के लाया गया. बंदरों के लिए वन विभाग के एनीमल हैसबंडरी विभाग से मदद मांगी गई थी.

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बंदरों के लाने के बाद ट्रायल शुरू किया गया. ट्रायल में बंदरों के शरीर में कोरोना वायरस चले गए. इसके 14 दिन बाद जांच कराई गई. जिसमें कोरोना वायरस का प्रभाव नहीं दिखा. यह नतीजा हम सभी के लिए उत्साह प्रदान करने वाला साबित हुआ. डॉ भार्गव ने कहा 68 दिनों तक बंदरों की निगरानी की गई. उन्होंने बताया कि कोरोना से मुकाबले में स्वदेशी कोवैक्सीन कारगर है.

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