लखनऊ: ओलंपिक के लिए राजधानी में रहकर ट्रेनिंग करेंगे पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी

Smart News Team, Last updated: 11/12/2020 04:02 PM IST
  • टोक्यो ओलंपिक का रास्ता वाया लखनऊ खुलेगा. पैरालम्पिक खेल में बैडमिंटन को पहले शामिल नहीं किया गया था. पर 2020 में टोक्यो में होने वाले पैराम्पिक खेल में बैडमिंटन को शामिल कर लिया गया. गौरव खन्ना, मुख्य कोच, भारतीय टीम ने कहा, पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी किसी भी मामले में सामान्य खिलाड़ियों से कम नहीं हैं.
लखनऊ: ओलंपिक के लिए राजधानी में रहकर ट्रेनिंग करेंगे पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी

लखनऊ: देश के पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी अगले साल टोक्यो में होने वाले पैरालंपिक में दमदार प्रदर्शन कर सकें इसके लिए वे राजधानी में पसीना बहाएंगे. भारतीय खेल प्राधिकरण ने सरोजनीनगर स्थित साई सेंटर में आठ पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों के कैम्प को मंजूरी दी है. यह कैम्प 15 दिसम्बर से शुरू होगा. कैम्प के लिए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी पलक कोहली, सुकांत कदम, कृष्णा पहले से ही यहां हैं. अन्य खिलाड़ी भी एक-दो दिन में यहां पहुंच जाएंगे.

कैम्प में जिन खिलाड़ियों को शामिल किया गया है उनमें विश्व चैंपियन रहीं पारुल परमार, अर्जुन पुरस्कार विजेता मनोज सरकार, राजकुमार के अलावा प्रमोद भगद, तरुण ढिल्लन, कृष्णा नागर, पलक कोहली और सुकांत कदम हैं. कैम्प के मुख्य कोच हाल ही में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित राजधानी के गौरव खन्ना बनाए गए हैं. सहायक कोच मंजय यादव और रोहित भाकर होंगे. अनुराग दीक्षित और जय प्रकाश दीक्षित फिजियो, लक्ष्य फिजिकर ट्रेनर नियुक्त किए गए हैं.

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टोक्यो ओलंपिक में होगा बैडमिंटन

पैरालम्पिक खेल में बैडमिंटन को पहले शामिल नहीं किया गया था. पर 2020 में टोक्यो में होने वाले पैराम्पिक खेल में बैडमिंटन को शामिल कर लिया गया. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक काउंसिल ने इंटरनेशनल पैरालम्पिक कमेटी से बात कर यह फैसला किया है. इसमें व्हील चेयर, स्टैण्डिंग लोअर (एसएल) व स्टैण्डिंग अपर (एसयू) की सभी कैटेगरी के मुकाबले होंगे.

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यूं हुई पैरालंपिक की शुरुआत

समर ओलंपिक के साथ ही पैरालम्पिक की शुरुआत 1948 में लंदन ओलंपिक से हुई थी. ओलंपिक की गहमागहमी के बाद उसी मैदान पर पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने की होड़ अब ओलंपिक कैलेंडर का नियमित हिस्सा बन गया है. दिव्यांग खिलाड़ी पूरे जोश और जज्बे के साथ पदक तालिका में अपना और अपने देश का नाम दर्ज कराने के लिए वर्षों की मेहनत को झोंक देते हैं. लेकिन पैरालंपिक खेलों की शुरुआत की बड़ी दिलचस्प कहानी है. इन खेलों के मौजूदा स्वरुप की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद घायल सैनिकों को मुख्यधारा से जोड़ने के मकसद से हुई. खास तौर पर स्पाइनल इंज्यूरी के शिकार सैनिकों को ठीक करने के लिए इस खेल को शुरू किया गया. साल 1948 में विश्वयुद्ध के ठीक बाद स्टोक मानडेविल अस्पताल के नियोरोलोजिस्ट सर गुडविंग गुट्टमान ने सैनिकों के रिहेबिलेशन के लिए खेल को चुना. तब इसे अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स का नाम दिया गया था.

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घायल सैनिकों के लिए कराया स्पोर्ट्स कंपीटिशन पहली दफा 1948 में लंदन में हुआ. इतना ही नहीं गुट्टमान ने अपने अस्पताल के ही नहीं दूसरे अस्पताल के मरीजों को भी स्पोर्ट्स कंपीटिशन में शामिल किया. 1952 ओलंपिक में फिर इसका आयोजन किया गया. इस बार ब्रिटिश सैनिकों के साथ ही डच सैनिकों ने भी हिस्सा लिया. इस तरह इसने पैरालंपिक खेलों के लिए एक ग्राउंड तैयार किया. सोच साकार हुई और 1960 रोम में पहले पैरालंपिक खेल हुए. पहले पैरालंपिक खेलों में 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. शुरुआती पैरालंपिक में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. लेकिन 1976 में दूसरे तरह के पैरा लोगों को भी पैरालंपिक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया. तब से अब हर ओलंपिक खेल के तुरंत बाद उसी स्थान पर पैरालम्पिक खेलों का चलन चला आ रहा है. हर वर्ष कुछ न कुछ नए खेल इसमें शामिल होते गए.

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‘भारतीय पैरा खिलाड़ी भी उम्दा प्रदर्शन कर रहे हैं. भारतीय खेल प्राधिकरण भी इनकी मदद कर रहा है. लखनऊ के साई सेंटर ने बेहद कम समय में सफलता के झण्डे गाड़े हैं. जितने भी कैम्प यहां लगते हैं उनके खिलाड़ी या टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जरूर जीतती हैं. इस सेंटर में ही ट्रेनिंग कर साक्षी मलिक ने रियो ओलंपिक में कुश्ती का कांस्य पदक जीता था. पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों को देखते हुए सेंटर में सभी सुविधाएं मुहैया कराई गईं. खिलाड़ियों के लिए मल्टीपरपज हाल के द्वार से लेकर भीतर हॉल तक जाने के लिए रैम्प बनवाया गया.

संजय सारस्वत

निदेशक साई सेंटर

‘पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी किसी भी मामले में सामान्य खिलाड़ियों से कम नहीं हैं. इनमें जोश, जज्बा और जूझने की अद्भुत क्षमता है. ये आसानी से कोई चीज नहीं छोड़ते. यही कारण है कि शारीरिक दिक्कतों के बावजूद ये खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं. इनसे जिंदगी जीने का सलीका सीखा जा सकता है. ये आपको सीख देते हैं कि मन में विश्वास हो, हौसला हो, ईमानदारी से की गई मेहनत हो तो हर चीज हासिल की जा सकती है. भारतीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी पहले तो वर्ल्ड चैंपियनशिप में कमाल दिखाकर लौटेंगे. अगले साल टोक्यो में होने वाले पैरालम्पिक में भारतीय टीम नया इतिहास रचेगी.

गौरव खन्ना

मुख्य कोच, भारतीय टीम

 

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