महज पांच जानवरों से शुरू हुआ लखनऊ जू मना रहा स्थापना का 100वां साल, जानें पूरा सफर

ABHINAV AZAD, Last updated: Mon, 29th Nov 2021, 9:18 AM IST
  • लखनऊ का नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान अपनी स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है. साल 1921 में खुला यह चिड़ियाघर कभी बनारसी बाग तो कभी प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन के नाम से जाना गया.
लखनऊ जू को पहले प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन के नाम से जाना जाता था.

लखनऊ. सोमवार को राजधानी का नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरा कर लेगा. कभी नवाब नसीरूद्दीन हैदर के बसाये बनारसी बाग में कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने शेर, चीता और हाथी जैसे कुछ जानवर लाकर यहां रखे. लेकिन धीरे-धीरे यह जगह विस्तार लेती गई. साथ ही पशु-पक्षियों की तादाद भी बढ़ती गई. आज के समय में इस उद्यान में हजारों की तादाद में पशु-पक्षियों को देखा जा सकता है. इन पशु-पक्षियों के दीदार के लिए प्रतिदिन हजारों लोग यहां आते हैं.

दरअसल, पशु-पक्षियों की तादाद बढ़ने के बाद यह चिड़ियाघर के रूप में जानी जाने लगी. साल 1921 में खुला यह चिड़ियाघर कभी बनारसी बाग तो कभी प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन के नाम से जाना गया. बनारस से आए आम के पेड़ों की वजह से नाम बनारसी बाग पड़ा था. लेकिन अब मौजूदा वक्त में नवाब वाजिद अली शाह जूलॉजिकल गार्डन के नाम से इसकी पहचान है.

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राज्य संग्रहालय के पास राजहंस टीयू 124 विमान बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र है. दरअसल, यह विमान रूस ने भारत को भेंट किया था. विमान 1981 में अमौसी एयरपोर्ट लाया गया था. चाचा नेहरू ने इस हवाई जहाज में बैठकर कई देशों की यात्रा की थी. लखनऊ के इस चिड़ियाघर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि कई वन्यजीव छोड़कर चले गए. वे आज के वक्त में जीवित तो नहीं हैं, पर उनकी चर्चा आज भी होती है. लोग बताते हैं कि एक वक्त में हुक्कू बंदर सबसे प्यारा था. चिड़ियाघर में घुसते ही कुक्कू...कू... की आवाज आते लोग उसी तरफ दौड़ पड़ते थे. कालू नाम से हुक्कू की पहचान थी. इस बंदर को देहरादून के चिड़ियाघर से लाया गया था. लेकिन 2017 में इसकी मौत हो गई.

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