परीक्षा में उच्चतम अंक लाना मेरिट की पहचान नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Sumit Rajak, Last updated: Mon, 31st Jan 2022, 7:06 AM IST
  • नीट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे मिथकों को तोड़े हैं, जिससे पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की सोच में बहुत बड़ा बदलाव आया है. कोर्ट ने फैसले में विश्व भर में आरक्षण (अफरमेटिव एक्शन) देने के सिद्धांतों का विस्तार से बताया है और उसके पीछे के दर्शन को गहराई से रेखांकित किया है और कहा है कि उच्च अंक लाना मेरिट की पहचान नहीं है.
फाइल फोटो

लखनऊ. नीट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे मिथकों को तोड़े हैं, जिससे पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की सोच में बहुत बड़ा बदलाव आया है. कोर्ट ने फैसले में विश्व भर में आरक्षण (अफरमेटिव एक्शन) देने के सिद्धांतों का विस्तार से बताया है और उसके पीछे के दर्शन को गहराई से रेखांकित किया है और कहा है कि उच्च अंक लाना मेरिट की पहचान नहीं है.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा है कि आरक्षण विरोधी भारत में एक ऐसी व्यवस्था सृजित करते हैं और दलील देते हैं कि आरक्षण नीति मेरिट आधारित समाज के खिलाफ है. इस शोर में वे उच्च अंकों को मेरिट के रूप में पेश करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि परीक्षाएं शैक्षणिक अवसरों को वितरित करने का एक आवश्यक और सहज तरीका मात्र है. परीक्षा में हासिल किए गए अंक हमेशा किसी व्यक्ति की मेरिट तय करने का सही पैमाना नहीं होते. क्योंकि व्यक्ति की प्रतिभा उसकी परीक्षा में दिखाई गई परफॉर्मेंस से आगे जा सकती है.

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यही वजह है कि अब विश्वविद्यालयों ( दिल्ली विवि समेत) ने अंकों के आधार पर दाखिला देने के बजाए कई टेस्ट लेने अनिवार्य कर दिए हैं, जैसे वस्तुनिष्ठ परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन, पर्सनालिटी टेस्ट, इंटरव्यू, वायवा, लिखित परीक्षा और व्यक्तिगत प्रेजेंटेशन आदि. इसके पीछे सिद्धांत यही है कि कोई एक छात्र परीक्षा में सही परफार्म नहीं कर सका है, लेकिन वह दूसरे टेस्ट में बेहतर कर सकता है. इस का परिणाम यही है कि यदि छात्र का एक ही तरीके से मूल्यांकन किया जाता है वह मेरिटोरियस छात्र नहीं कहा जा सकता.

सांस्कृतिक पूंजी और  सामाजिक नेटवर्क

कोर्ट ने कहा कि कहा जाता है कि सामान्य वर्ग के छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्यादा अंक कड़ी मेहनत से लाते हैं, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिलता, क्योंकि आरक्षण के कारण कम अंक वाला छात्र प्रवेश पा जाता है. कड़ी मेहनत के कारण उन्हें दंडित किया जाता है, लेकिन कोर्ट ने इस दावे का कड़ा विरोध किया है और कहा है कि किसी छात्र का ज्यादा अंकों में यह अंतर विशेष सुविधाएं, संपन्नता या परिस्थितियों के कारण हो सकते हैं, सिर्फ कड़ी मेहनत के कारण ही नहीं. यह सामाजिक नेटवर्क और सांस्कृतिक पूंजी जिसमें संवाद स्किल, उच्चारण, किताबों या शैक्षणिक उपलब्धियों के कारण होता है, जो वे अपने परिवार से विरासत के रूप में पाते हैं.

इस माहौल में बच्चा अनजाने में ही प्रशिक्षित होता रहता है. साथ ही परिवार के स्टैंडर्ड के मुताबिक उच्च पद प्राप्त कर लेता है. लेकिन यह बात एक ऐसे व्यक्ति के लिए नुकसान का कारण बनती है, जो प्रथम पीढ़ी का छात्र है और एक ऐसे समुदाय से आता है. जिसका परंपरागत व्यवसाय उस तरह के स्किल नहीं दे पाता, जो एक ओपन परीक्षा में बेहतर करने के लिए आवश्यक हैं. उन्हें अगड़े लोगों के साथ स्पर्धा करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं.

 

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