SC ने लगाया UP के मेडिकल कॉलेज पर जुर्माना, काउंसिल के नियमों का हुआ था उल्लंघन

Smart News Team, Last updated: Thu, 25th Feb 2021, 10:23 AM IST
  • UP के मेडिकल कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 करोड़ का जुर्माना लगाया है. मेडिकल काउंसिल के नियमों के विरुद्ध जाकर 132 छात्रों को एमबीबीएस में दाखिला देने के मामले में एससी ने आदेश दिया है.
लखनऊ के सरस्वती मेडिकल कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 करोड़ का जुर्माना लगाया.

लखनऊ. यूपी की राजधानी के सरस्वती मेडिकल कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने भारी जुर्माना लगाया है. मेडिकल काउंसिल के नियमों के विरुद्ध 132 छात्रों को एमबीबीएस कोर्स में एडमिशन देने के मामले में एससी ने पांच करोड़ का जुर्माना लगाया है. इसी के साथ कोर्ट ने इस कॉलेज में एडमिशन लेने वाले छात्रों को आदेश दिया है कि वह एमबीबीएस पूरी करने के बाद दो साल तक सामुदायिक सेवा करेंगे. इस सेवा के नियमों को लेकर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया नियम तय करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जुर्माने की पांच करोड़ रुपए की रकम गरीब छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन देने में सहायता देगी. कोर्ट ने इसके लिए यूपी के महालेखाकर को लेकर एक ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है. इसी के साथ यह पहला मौका है जब सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल छात्रों को सामुदायिक सेवा करने का आदेश दिया है. 

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कोर्ट ने यह आदेश इसलिए छात्रों को दिया है क्योंकि उन्हें पता था कि काउंसिल ने इस कॉलेज को उन्हें एडमिशन देने के लिए अधिकृत नहीं किया है क्योंकि वह नीट की मेरिट के अनुसार एडमिशन के हकदार नहीं थे लेकिन फिर भी उन्होनें एडमिशन लिया. सुप्रीम कोईट ने कहा कि छात्रों का 2017-18 का प्रवेश एकदम अवैध और नियमों के विरुद्ध है और उनकी ये याचिका खारिज होनी चाहिए थी. वहीं अब वह दो साल की पढ़ाई कर चुके हैं और इस समय उनका एडमिशन रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है. बता दें कि यह याचिका अधिवक्ता राजीव कुमार दुबे ने दाखिल की थी. 

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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस रविंद्र भट्ट की पीठ ने इस फैसले पर कहा कि छात्रों को पता था कि वह गलत तरीके से एडमिशन ले रहे हैं. इसी के कारण उन्हें कोर्स पूरा करने के बाद सभी 132 छात्रों को दो सालों के लिए सामुदायिक सेवा देनी होगी. सर्वोच्च न्यायलय ने कॉलेज के नियंत्रक विश्वविद्यालय छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर को आदेश दिया है कि वह इन स्टूडेंट्स की दूसरे साल की परीक्षाएं करवाएं और नतीजे घोषित करे. वहीं आदेश यह आदेश छात्रों के तीन साल बचाने के लिए दिया गया है और यह केस इसी तरह के अन्य मामलों में नजीर के तौर पर इस्तेमाल नहीं होगा. 

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