अहोइ अष्टमी पर जरूर करें राधा कुंड स्नान, निःसंतान को मिलता है संतान, जानिए महत्व

Indrajeet kumar, Last updated: Wed, 27th Oct 2021, 3:58 PM IST
  • संतान प्राप्ति और संतान कि लंबी उम्र के लिए किया जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत पर राधा कुंड स्नान का विशेष महत्व है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी निसंतान दंपत्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि को राधा कुंड में एक साथ स्नान करते हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है. इस दिन पति और पत्नि दोनों ही निर्जला व्रत रखते हैं
राधा कुंड

लखनऊ. संतान प्राप्ति और संतान कि लंबी उम्र के लिए किया जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत इस वर्ष गुरुवार 28 अक्टूबर के दिन किया जाएगा. कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है. इस व्रत पर राधा कुंड स्नान का भी विशेष महत्व है. मथुरा से करीब 26 किलोमीटर दूरी पर गोवर्धन परिक्रमा में राधा कुंड स्थित है. ये कुंड परिक्रमा के लिए सांसे मुख्य पड़ाव. पौराणिक मान्यता है कि इस कुंड में जो भी निसंतान दंपत्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि को राधा कुंड में एक साथ स्नान करते हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है. इसी मान्यताओं के कारण दूर-दूर से लोग राधा कुंड में स्नान करने आते हैं.

अहोई अष्टमी के दिन पति और पत्नि दोनों ही निर्जला व्रत रखते हैं और मध्य रात्रि में राधा कुंड में डूबकी लगाते हैं. कहा जाता है कि ऐसा करने पर उस दंपत्ति को संतान सुख प्राप्त होता है. जिन दंपत्तियों की संतान की मनोकामना पूरी हो जाती है, वे भी अहोई अष्टमी के दिन अपनी संतान के साथ यहां राधा रानी की शरण में आते हैं. और राधा कुंड में स्नान करते हैं. कहा जाता है कि ये प्रथा द्वापर युग से आज तक चलती आ रही है.

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पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन में गाय चराने जाते थे. तभी अरिष्टासुर नाम के एक असुर ने गाय के बछड़े का रूप धारण करके श्रीकृष्ण पर हमला करना चाहा लेकिन श्रीकृष्ण ने उसको मार दिया. राधा कुंड क्षेत्र पहले अरीध वन थी जो राक्षस अरिष्टासुर का क्षेत्र था. कृष्ण ने अरिष्टासुर का वध गाय के बच्चे के रूप में किया था, इसलिए राधा जी ने श्रीकृष्ण को चेतावनी दी कि उन्हे गौवंश हत्या का पाप लगेगा. ये सुनकर श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से ही एक कुंड खोदकर और उसमें स्नान किया. इसके बाद से ही श्रीकृष्ण के खोदे गए कुंड को श्याम कुंड और राधाजी के कुंड को राधा कुंड कहा जाने लगा.

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