स्कंद षष्ठी व्रत कब है, जानें भगवान कार्तिकेय की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Anuradha Raj, Last updated: Sat, 11th Sep 2021, 2:25 PM IST
  • स्कंद षष्ठी का व्रत तमिल हिंदुओं में काफी प्रचलित है. ये व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को समर्पित होता है. कार्तिकेय को मुरुगन और ,सुब्रहम्नय के नाम से भी जाना जाता है.
स्कंद षष्ठी का व्रत

 स्कन्द देवता तमिल हिंदुओं में काफी पॉपुलर है. भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं स्कन्द देव और गणेश जी के छोटे भाई हैं. भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय और सुब्रहम्नय के नाम से भी जाना जाता है. भगवान स्कन्द को षष्ठी तिथि समर्पित होती है. श्रद्धालु लोग शुक्ल पक्षा की षष्ठी के दिन उपवास रखते हैं. जिस दिन पन्चमी तिथि के संग षष्ठी तिथि मिल जाती है, उस दिन स्कन्द षष्ठी का व्रत रखा जाता है.  ऐसे में पन्चमी तिथि के दिन भी स्कन्द षष्ठी का व्रत रखा जा सकता है. कन्द षष्ठी के नां से भी स्कन्द षष्ठी को जाना जाता है. 

जानें स्कन्द षष्ठी का महत्व

भगवान कार्तिकेय को ये तिथि बेहद ही प्रिय होती है.दैत्य ताड़कासुर का इसी दिन कार्तिकेय ने वध किया था. चंपा के फूल भगवान कार्तिकेय को खूब पसंद है. ऐसे में इसे चंपा षष्ठी के नाम से भी जाता जाता है. दक्षिण भारत में मुख्य रूप से इस पर्व को मनाया जाता है. कार्तिकेय को ही मुरुगन, सुब्रह्मन्य और स्कन्द देव के नाम से ही जाता है.

स्कन्द षष्ठी की पूजन विधि

सुबह जल्दी से स्नान कर लें, व्रत करने का संकल्प लें. इस दिन अपने घर में कार्तिकेय भगवान के साथ-साथ शिव और पार्वती की प्रतिमा की स्थापना भी करनी चाहिए. उसके बाद घी के दीपक जलाकर, जल, पुष्प जरूर अर्पित करें. हल्दी, चंदन, कलावा, अक्षत से पूजा करें. फल, फूल का प्रसाद चढ़ाएं. व्रत दिन भर रखें. शाम के समय भी इस विधि से पूजा करें, आरती करें और भोग लगाएं.

ये है स्कंद षष्ठी शुभ मुहूर्त 2021

शुक्ल ष्ष्ठी, भाद्रपद

7 बजकर 37 मिनट 11 सितम्बर को प्रारम्भ होगा

5 बजकर 20 मिनट 12 सितम्बर को समाप्त हो जाएगा

ये है भगवान कार्तिकेय का मंत्र

देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव.

कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥

ये है व्रत कथा

माता सती दक्ष के यज्ञ में भस्म हो गईं थी, उसके बाद विलाप करते हुए शिव जी गहरी तपस्या में लीन हो गए थे. शिव जी के ऐसा करने से पूरी सृष्टि ही शक्तिहीन हो गई. चारों तरफ दैत्य ताड़कासुर का आतंद फैंल चुका था. ब्रह्माजी के पास सभी देवता गए. 

व्रत कथा

दक्ष के यज्ञ में माता ‘सती’ भस्म हो गईं, तब शिव जी विलाप करते हुए गहरी तपस्या में लीन हो गए. उनके ऐसा करने से सृष्टि शक्तिहीन हो गई. दैत्य ताड़कासुर का आतंक चारों ओर फैल गया. हाहाकार मच गया. ब्रह्माजी ने तब कहा कि शिव पुत्र ही तारक का अंत करेगा. उसके बाद इंद्र समेत अन्य देवता भगवान शिव के पास पहुंच गए, उन्होंने माता पार्वती की तपस्या का जिक्र किय़ा. भगवान शंकर ने उसके बाद पार्वती की परीक्षा ली, और उनसे खुश होकर वरण किया उनका. उसके बाद ही कार्तिकेय का जन्म हुआ, ताड़कासुर का वध कर कार्तिकेय ने देवों का उद्धार किया.

 

 

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