Vishwakarma Puja 2021: 17 सितंबर को है विश्वकर्मा पूजा, जानिए पूजा विधि, मुहूर्त और कथा

Anuradha Raj, Last updated: Thu, 16th Sep 2021, 8:03 PM IST
  • हिंदू धर्म में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व होता है. ये पूजा भगवान विश्वकर्मा को समर्पित होता है. हर साल विश्वकर्मा दिवस 17 सितंबर को ही मनाया जाता है.
विश्वकर्मा पूजा 2021

भगवान विश्वकर्मा को शिल्प का देवता कहा जाता है, ऐसे में उनकी जयंती कल यानी 17 सितंबर को मनाई जाती है. इस दिन भगवान विश्वकर्मा की दुकानों, वर्कशॉप, कंपनी समेत हर जगह पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि पहले इंजीनियर और वास्तुकार विश्वकर्मा ही हैं. उन्होंने ही स्वर्ग लोक में यमपुरी, कुबेरपुरी, द्वारिका नगरी, पुष्पक विमान आदि का निर्माण किया था.

ये है विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त

17 सितंबर विश्वकर्मा दिवस के दिन एक घंटे 32 मिनट तक राहुकाल रहने वाला है. इस दौरीन विश्वकर्मा पूजन नहीं की जाती है. विश्वकर्मा दिवस पर 10 बजकर 43 मिनट पर राहुकाल की शुरुआत होगी जो दोपहर 12 बजकर 15 मिनट पर खत्म हो जाएगी.

सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति विश्वकर्मा पूजन का बेहद ही महत्व है. ऐसे में इस साल 17 सितंबर को सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति दोपहर 1बजकर 29 मिनट तक रहेगी. ज्योतिषाचार्य पं. रामप्रवेश पांडेय के अनुसार औजारों, निर्माण से जुड़ी मशीनों, दुकानों आदि में दोपहर 12 बजकर 16 मिनट से सूर्यास्त तक पूजा का समय बहुत ही ज्यादा उपयुक्त माना जाता है. इतना ही नहीं बल्कि सबसे अच्छी बात तो ये है कि इस दिन सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है. 6 बजकर 7 मिनट से सर्वार्थ सिद्धि योग की शुरुआत हो जाएगी. 3 बजकर 36 मिनट तक भोर में 18 सितंबर को योग रहेगा. इस योग में विश्वकर्मा पूजा की जाएगी तो वो बहुत ही ज्यादा फलदायी होगा.

ऐसे करें पूजा

कामकाज में उपयोग आने वाली मशीनों को इस दिन साफ करना चाहिए. उसके बाद स्नान आदि करके भगवान विष्णु के संग विश्वकर्माजी की प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए. ऋतुफल, मिष्ठान्न, पंचमेवा, पंचामृत का भोग लगाना चाहिए. धूप-दीप जलाकर देवताओं की आरती करनी चाहिए.

ये है कथा

शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर अलग-अलग कथाओं का वर्णन किया गया है. वराह पुराण की मानें तो विश्वकर्मा को धरती पर ब्रह्माजी ने उत्पन्न किया था. विश्वकर्मा पुराण के अनुसार सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना आदि नारायण ने की थी. इतना ही देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से भी भगवान विश्वकर्मा के जन्म को जोड़ा जाता है. ऐसे में भगवान विश्वकर्मा के जन्म से लेकर जो कथाएं शास्त्र में मिलती है, उससे ये समझ आथा है कि विश्वकर्मा एक नहीं कई हुई हैं. साथ ही अपने कार्यों और ज्ञान से समय-समय पर सृष्टि के विकास में सहायक साबित हुए. शास्त्रों में जिस प्रकार से वर्णन किया गया है उससे ये लगता है कि विश्वकर्मा एक प्रकार का पद या उपाधि है. शिल्पशास्त्र का श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाले को विश्वकर्मा कहा जाता था. सबसे पहले विराट विश्वकर्मा, उसके बाद धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरावंशी तब सुधान्वा विश्वकर्मा हुए थे. उसके बाद शुक्राचार्य के पौत्र भृगुवंशी विश्वकर्मा हुए थे. ऐसी मान्यता है कि देवताओं के विनती करने पर विश्वकर्मा ने महर्षि दधीची की हड्डियों से स्वर्गाधिपति इंद्र के लिए एक बेहद ही शक्तिशाली वज्र बनाया था.

 

 

 

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