नया नहीं अफसरों का चुनाव में उतरना, कोई मंत्री बना तो कोई जमानत तक नहीं बचा पाया

Smart News Team, Last updated: 24/09/2020 10:09 AM IST
  • मंगलवार तक बिहार डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पांडेय के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने के बाद से ही बिहार में आला अफसरों के राजनीति में जाने को लेकर भी चर्चा होने लगी है. इसमें ऐसे कई नाम निकल कर आते हैं जिन्होंने इस्तीफा देने के बाद राजनीति में दांव आजमाया. 
गुप्तेश्वर पांडेय (फाइल फोटो)

पटना. गुप्तेश्वर पांडेय के बिहार डीजीपी पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने के बाद उनके राजनीति में आने को लेकर चर्चा जोरों पर है. अलग-अलग राजनीतिक पंडितों ने तो बकायदा पार्टी से लेकर उनके टिकट तक की भविष्वाणी कर दी है. लेकिन गुप्तेश्वर पांडेय पहले ऐसे अफसर नहीं हैं जिनके राजनीति में जाने की चर्चा हो रही है. या पहली बार कोई अफसर राजनीति में गया हो. इस खादी से खाकी का लगाव नया नहीं है. कई आईएएस से लेकर आईपीएस और आईआरएस सेवा तक के अधिकारी राजनीति में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं. हार-जीत की ज्यादा परवाह किए बिना दशकों से बड़े से बड़े अधिकारी राजनीति में दांव आजमाते रहे हैं. 

इनमें से बहुत से लोग कभी सांसद बने, कभी मंत्री तो कभी विधायक. इनमें से बहुत लोग हारे भी. ऐसे में, गुप्तेश्वर पांडेय के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने के बाद से ही आला अफसरों की राजनीति में दिलचस्पी का मुद्दा चर्चा का केन्द्र बना हुआ है.

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बिहार में इसके कई उदाहरण मिल जाते हैं जब एक आला अधिकारी ने राजनीति में अपने झंडे गाड़े हैं. इसमें बिहार के दो आला अधिकारी ना सिर्फ चुनाव जीते बल्कि केन्द्र में मंत्री तक बने. इनमें से एक हैं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और देश के पूर्व कैबिनेट सचिव रहे आरके सिंह. ये केन्द्र में मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं. रिटायरमेंट के बाद इन्होंने 2014 में आरा से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गए. 

इसके पहले आईपीएस अधिकारी ललित विजय का उदाहरण मिलता हैं. इन्होंने जेडीयू के टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ा था. वहां से जीत हासिल कर यह भी केन्द्र में राज्यमंत्री बने. इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बेटे और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे निखिल कुमार औरंगाबाद से सांसद रहे चुके हैं. वह बाद में राज्यपाल भी रहे.

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लेकिन ऐसा नहीं है कि जितने अफसर चुनाव में उतरे सभी जीते ही. कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं जिन्हें राजनीति में उतनी सफलता हासिल नहीं हुई. इसमें पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा का नाम लिया जाता है. रंजन साल 2014 में नालंदा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरे लेकिन जीत नहीं सकें. आशीष रंजन से पहले सीपीआई के टिकट पर डीजीपी रह चुके डी पी ओझा भी लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं.

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