बिहार: पपीते के पपेन से किसानों की हो रही है अच्छी कमाई, यूरोप में है काफी मांग

Smart News Team, Last updated: Sat, 15th Jan 2022, 11:57 AM IST
  • बिहार में पपीते के दूध से बनने वाला पपेन का व्यवसाय करके किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि समस्तीपुर की अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना के तहत किसानों को पपीते की खेती करने और उसके दूध से पपेन बनाने की ट्रेनिंग देने में जुटा है.
बिहार में पपीते के पपेन से लाखों कमा रहे किसान

पटना. पपीता सेहत के लिए एक अच्छा फल माना जाता है. डॉक्टर हमेशा मरीजों को पपीता खाने की सलाह देते हैं. पपीते की खेती करके किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं. वहीं पपीते के दूध से बनने वाला पपेन का व्यवसाय करके किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. आमतौर पर की खेती 12 महीने की जाती है, लेकिन फरवरी माह से मई व अक्टूबर के बीच इसकी विशेष खेती की जाती है. इसकी खेती से सेहत ही नहीं बल्कि सौंदर्य भी बढ़ता है.

डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि समस्तीपुर की अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना के तहत किसानों को पपीते की खेती करने और उसके दूध से पपेन बनाने की ट्रेनिंग देने में जुटा है. राज्य सरकार की औषधीय पौधों की खेती की कड़ी में इस योजना को जोड़ने पर विचार कर रही है. देश में औषधीय गुण वाला पपेन तैयार करने की व्यवस्था आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, असम, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तरांचल और मिजोरम में हैं.

यूरोप में इसकी काफी मांग

इसके तहत बिहार में भी पपीते का उत्पादन और उत्पादक किसानों को पपेन का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करने को सरकार प्रयासरत हैं. अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना की डायरेक्टर रिसर्च डॉक्टर एसके सिंह बताते हैं कि बिहार के किसानों को जागरूक किया जा रहा है. यूरोप में इसकी मांग बहुत है. वैज्ञानिकों के अनुसार हरे और कच्चे पपीते से सफेद रस या दूध निकालकर सुखाए गए पदार्थ को पपेन कहते हैं.

इन बीमारियों के लिए उपोयोगी दवा

पपेन एक पाचक एंजाइम है. इसका उपयोग प्रोटीन को पचाने, च्विंगम बनाने, पेपर, कारखाने में दवाओं के निर्माण में सौंदर्य प्रसाधन बनाने आदि में किया जाता है. पपेन से पेट का अल्सर, दस्त, एक्जिमा, लीवर के रोग, कैंसर के इलाज में उपयोगी दवा तैयार की जाती है.

ऐसे बनाया जाता है पपेन

पपेन प्राप्त करने के लिए 3 महीने पुराने फलों का डंठल की ओर से करीब 3 मिमी गहराई के 4-5 चीरे लंबाई में लगाए जाते हैं. चीरा लगाने के बाद तुरंत फलों से दूध निकलने लगता है, जिससे किसी मिट्टी या एलुमिनियम के बर्तन में रख लिया जाता है. चीरा लगाए गए फलों को पकाने के लिए छोड़ दिया जाता है.

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