परम्परागत खेती के लिए मौसम है अनुकूल, गेहूं-मक्का की होगी अच्छी पैदावार, तिलहन-दलहन देंगे दगा

Sumit Rajak, Last updated: Mon, 24th Jan 2022, 11:57 AM IST
  • रबी के लिए वर्षों बाद स्थितियां अनुकूल हुई हैं. लंबे समय तक जलजमाव रहने से मिट्टी रीजार्च हुई है. वही इस बार ठंड की अवधि भी लंबी हो गई तो किसानों को रबी की खेती के अनुकूल समय मिला.
फाइल फोटो

पटना. रबी के लिए वर्षों बाद स्थितियां अनुकूल हुई हैं. लंबे समय तक जलजमाव रहने से मिट्टी रीजार्च हुई है. वही इस बार ठंड की अवधि भी लंबी हो गई तो किसानों को रबी की खेती के अनुकूल समय मिला. हालांकि वर्षा होने से तेलहन और दलहन की फसल को नुकसान हुआ है, लेकिन किसानों को बहुत परेशानी नहीं होगी. बता दें कि रबी की सारी फसलें ठंड वाली होती हैं. गेहूं के लिए न्यूनतम तापमान आठ डिग्री सेल्सियस से कम ही होना चाहिए. अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए, वह भी बाली पकने के समय. लेकिन तापमान हमेशा 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे होना चाहिए. इस साल अब तक वह स्थिति बनी रही. जबकि न्यूनतम तापमान चार डिग्री से नीचे नहीं होना चाहिए. पाला गिरने से फसल को नुकसान होता है. 

कुछ इलाके में ओला गिरने से परेशानी हुई. मगध क्षेत्र के अलावा रोहतास और भोजपुर के साथ कोसी के कुछ इलाके भी ओला से प्रभावित हुए. इससे तिलहन की फसल तो चौपट हो गई. दलहन पर भी व्यापक असर पड़ा. टाल क्षेत्र में मसूर की खेती पर इसका काफी असर है. वही टाल क्षेत्र में लगभग दस हजार हेक्टेयर की फसल पर ओला गिरने से नुकसान हुआ है. कुछ अन्य जिलों में तापमान गिरने से आलू की फसल बरबाद हुई है. जबकि गेहूं के साथ अगात लगाई गई सरसों की फसल को नुकसान हुआ है. जहां सरसों की फसल में फूल लगे हैं, वहां तो खती चौपट हो गई.

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मानसून का तेवर हर साल बदलाव हो रहा है. पहले राज्य में बरसात में औसत 1200 से 1500 मिलीमीटर वर्षा होती थी. पिछले तीस वर्षों का औसत घटकर 1017 मिलीमीटर रह गया है. वही हाल के 11 वर्षों का औसत मात्र 884 एमएम रहा. वर्ष 2018 में तो मात्र 771.3 एमएम ही वर्षा हुई. साथ ही प्री मॉनसून वर्षा का आंकड़ा भी हर वर्ष घटता जा रहा है. वर्ष 2009 से लेकर 2018 तक जून में वर्षा की कमी 28 से 60 प्रतिशत तक रही है. 2020 में 1090.4 एमएम वर्षा हुई लेकिन जून में 82 प्रतिशत अधिक तो अगस्त में 29 प्रतिशत कम हुई. पिछले खरीफ में भी 1025 एमएम वर्षा हुई लेकिन जून में 111 प्रतिशत वर्षा हो गई. 

सरकार ने बदला योजनाओं का समय 

मौसम में बदलाव को देखकर सरकार ने समय प्रबंधन शुरू कर दिया है. वही बीज वितरण का काम अब 30 नवम्बर तक खत्म करने का फैसला किया है. इसके पहले विभाग दिसम्बर तक बीज बांटता था. खाद्य उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने अनाज खरीद का समय  में बदलाव किया है. पहली बार एक नवम्बर से राज्य में अनाज खरीद शुरू हुई है. 15 फरवरी तक खरीद बंद करनी है.

किसान अब ऐसी फसलों का चयन कर रहे हैं जिनमें मौनसून के बदलाव का असर कम हो. बेगूसराय के किसानों ने सोयाबीन की खेती शुरू कर दी है. अब वहां धान की खेती बहुत कम होती है. अररिया और पूर्णिया के किसानों ने मुंगफली की खेती पर जोर देना शुरू किया है. अब वहां गेहूं की खेती लगभग खत्म हो गई है और इसकी जगह मक्का ने ले ली है. सीमांचल में किसानों ने सूर्यमुखी की खेती शुरू कर दी है.धान उत्पादक जिले रोहतास में भी औषधीय पौधों की खेती का रकबा काफी बढ़ गया है. खगड़िया कृषि विज्ञान केन्द्र के मुख्य वैज्ञानिक जितेन्द्र कुमार कहते हैं सोयाबीन की खेती इलाके में बढ़ी है. इसी तरह मधेपुरा के वैज्ञानिक विपुल मंडल ने स्वीकार किया कि सूर्यमुखी ने परम्परागत खेती को रिप्लेस करना शुरू कर दिया है.

 

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