लालू यादव जन्मदिन: लोगों के लालू, लालू के लोग: एक निराला संबंध- जयंत जिज्ञासु

Smart News Team, Last updated: 11/06/2021 06:10 PM IST
  • राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव 74 साल के हो गए हैं. उनके जन्मदिन पर लालू की अनकही दास्तान -द किंग मेकर- के लेखक जयंत जिज्ञासु ने ये आलेख लिखा है. जयंत जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में आरजेडी के अध्यक्ष कैंडिडेट रह चुके हैं और फिलहाल बिहार राज्य कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं. 
लालू यादव के जीवन पर आधारित किताब; द किंग मेकर

बिहार की राजनीति में श्रीकृष्ण सिंह के बाद सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने वाले लालू प्रसाद पहले मुख्यमंत्री थे. वे वंचितों के उन्नायक के रूप में भारत की राजनीति में पिछले पांच दशक से स्थापित हैं. उनकी राजनीति के केंद्र में समाज का आखिरी व्यक्ति रहा है. धर्मनिरपेक्षता को बड़ी ईमानदारी से सगुण रूप में समाज के अंदर मज़बूत करने के लिए उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा.

उन्होंने राबड़ी देवी के साथ मिलकर बिहार में सात विश्विद्यालय खोले, और प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए 15 नये ज़िले का गठन किया. वे विश्वविद्यालय थे:

1. जेपी यूनिवर्सिटी, छपरा

2. वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी, आरा

3. बीएन मंडल यूनिवर्सिटी, मधेपुरा

4. विनोबा भावे यूनिवर्सिटी, हजारीबाग

5. सिधो कान्हू मुर्मू यूनिवर्सिटी, दुमका

6. नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी (पहले आर्डिनेंस पर चल रहा था, लालू यादव ने एक्ट के जरिये फुल फ्लेज्ड यूनिवर्सिटी बनाई)

7. मौलाना मज़हरुल हक़ अरबी फारसी यूनिवर्सिटी, पटना (राबड़ी देवी के कार्यकाल में)

बिहार के 38 जिलों में 8 लालू प्रसाद और 1 राबड़ी देवी द्वारा स्थापित किये गये जिनके नाम हैं - जमुई, सुपौल, कैमूर, बक्सर, बांका, लखीसराय, शेखपुरा, शिवहर, और अरवल (राबड़ी देवी) हैं. एक पुलिस ज़िला बगहा भी बनाया गया. वहीं अविभाजित बिहार के झारखंड वाले इलाके में 7 नये जिले बनाये गये जिनके नाम कुछ इस तरह हैं - पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, बोकारो, गढ़वा, चतरा, पाकुड़ और कोडरमा. यानी मौजूदा झारखंड प्रांत के 24 में से 7 ज़िले लालू प्रसाद ने गठित किये.

1989 के भागलपुर दंगे में विषाक्त हो चुके बिहार में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने सत्ता संभालने के बाद 15 साल तक कोई बड़ा दंगा नहीं होने दिया। आडवाणी ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की तो उनको समस्तीपुर में सैंत के उड़नखटोला में बिठा के मसानजोड़ में अनलोड कर दिया। सीतामढ़ी में दंगा भड़काने की कोशिश हुई तो सुब्ह-सुब्ह भिनसरबा में डीएम के जगने के पहले खुद हेलिकॉप्टर लेकर पहुँच गए, और दंगाई भाग खड़े हुए।

जिस बिहार में आडवाणी की गिरफ़्तारी पर चिड़िया ने चू़ं तक नहीं किया था, बाबरी विध्वंस के बाद कहीं हिंसा नहीं भड़कने दी गई, उस बिहार को नीतीश-मोदी ने आज कहां से कहां पहुंचा दिया। लालू प्रसाद ने 2014 के आम चुनाव के वक़्त कहा था, “यह चुनाव तय करने जा रहा है कि देश रहेगा कि टूटेगा”। उस वक़्त किसी ने सोचा नहीं था कि आने वाला निजाम इस कदर ख़तरनाक साबित होगा कि मजहब के नाम पर उन्माद फैलाएगा, इलेक्शन कमीशन की ऐसी-तैसी करके रख देगा, बैंक के बैंक लुटवा देगा, लुटेरों को विदेश भगा देगा और जनता बेचारी त्राहिमाम करेगी।

पिछले साल दिल्ली को जिस तरह आग के हवाले कर दिया गया, वह क्या शासन-प्रशासन की ढिलाई के बगैर मुमकिन था? विद्रोही के शब्दों में, "यह आग लगी नहीं, लगाई गई है"। देश की हालत ठीक नहीं, और शासन में बैठे लोगों की चुप्पी उन्हें बेपर्दा व बरहना कर रही।

लालू प्रसाद ने 90 की रैली में पटना के गांधी मैदान से क़ौमी एकता के लिए जो हुंकार भरी थी और कड़े शब्दों में संदेश दिया था, इतिहास उसे कभी भुला नहीं सकता। उनके शब्द थे:

‘’मैं इस मंच के माध्यम से पुनः श्री आडवाणी जी से अपील करना चाहता हूं कि अपनी यात्रा को स्थगित कर दें। स्थगित कर के वो दिल्ली वापस चले जाएं, देशहित में। अगर इंसान ही नहीं रहेगा, इंसान नहीं रहेगा तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा? या कौन बजाएगा जब इंसानियत पर ख़तरा हो? इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत कौन देने जाएगा? चौबीस घंटा मैं निगाह रखा हूं, हमने अपने शासन के तरफ़ से, अपने तरफ़ से पूरा उनकी सुरक्षा का भी व्यवस्था किया। लेकिन, दूसरे तरफ़ हमारे सामने सवाल है… अगर एक नेता और एक प्रधानमंत्री का जितना जान का क़ीमत है, उतना आम इंसान का जान का भी क़ीमत है! हम अपने राज में मतलब दंगा-फ़साद को फैलने नहीं देंगे। जहां फैलाने का नाम लिया और जहां बावेला खड़ा करने का नाम लिया, तब फिर हमारे साथ चाहे राज रहे या राज चला जाए, हम इस पर कोई समझौता करने वाले नहीं हैं!” 

लालू प्रसाद एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय व साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रश्न को मनुष्यता का प्रश्न बनाया. जिन्होंने सोशल जस्टिस और सेक्युलरिज़म को निर्गुण नहीं, बल्कि सगुण रूप में जिया और ज़मीन पर उतारा. 

लालू यादव की पत्नी और पूर्व सीएम राबड़ी देवी को द किंगमेकर की कॉपी भेंट करते जयंत जिज्ञासु

74 साल के हुए लालू यादव, दिल्ली में पत्नी राबड़ी और बेटियों के साथ काटा केक

23 अक्टूबर 1990 का वह दिन, जब इस देश की बुनियाद व यहाँ के आईन को लहूलुहान करने निकले संघ के हिंसक, उन्मादी व बेलगाम घोड़े को लालू प्रसाद ने पकड़ के मसानजोड़ पहुंचा दिया; उस तारीख़ को दंगाइयों के उस्ताद ताउम्र नहीं भूल पायेंगे!

समाज में एकता कैसे कायम रखी जाती है, दंगा कैसे रोका जाता है, यह कोई लालू जी से सीखे। आडवाणी जी की गिरफ्तारी और बाबरी विध्वंस के बाद बिहार को आग की लपट से बचा लेने का वाक़या पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एक चैप्टर के रूप में पढाया जाना चाहिए। आखिर लालू होने का मतलब क्या है! लालू मतलब, पैराडाइम शिफ़्ट.

लेकिन, यहाँ पर इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि लालू प्रसाद ने भाजपा नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी की मानवीय गरिमा को किंचित भी ठेस नहीं पहुंचाई, और टेलिफ़ोन से उनकी ख़बर लेते रहे कि उन्हें स्वास्थ्य व खानपान संबंधी कोई दिक्कत नहीं हो. उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी से भी बात करते रहे. आज सार्वजनिक जीवन में इस मर्यादा व सदाशयता का घनघोर अभाव हो चला है, और सार्वजनिक विमर्श व संवाद का स्तर लगातार छिछला होता जा रहा है. लालू प्रसाद ने यह सफल प्रयोग करके दिखाया कि कैसे धर्मनिरपेक्ष राजनीति करते हुए सामाजिक न्याय को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है.

एक बार गुड़गाँव के फ़ैज़ भाई ने मुझसे कहा था, "भीड़ पागल हो चुकी हो, और हम ख़ून से लथपथ। उस वक़्त इस देश में एक ही नेता का ख़याल आता है जो उन दंगाइयों के बीच जाकर सड़क पर हमारे साथ लड़ेगा, और अपने दामन में समेट कर हमें बचा लेगा; उस नेता का नाम है - लालू यादव। यह आश्वस्ति, भरोसा और तस्कीन देकर इस मुल्क की मिल्लत और भाईचारे की परंपरा को बचाने वाले लालू को छोड़ कर मेरे अंदेशे को कोई और लीडर नहीं मिटा सकता, बचा ही नहीं है दूसरा कोई"। यह कोई मामूली सियासी पूंजी नहीं है, लालू जी की ज़िंदगी भर की कमाई है।

जब बिहार में दंगाई लोग हावी होने लगे और लोगों को भड़काने में जुटे दंगारोपी अश्विनी चौबे के बेटे को गिरफ्तार करने में नीतीश कुमार के हाथ-पाँव फूलने लगे तो तेजस्वी यादव ने सरकार को ललकारते हुए कहा था, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चार सिपाही के साथ केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के दंगा आरोपी फ़रार बेटे को पकड़ने की मुझे प्रशासनिक अनुमति दें। एक घंटे में घसीटकर नीतीश कुमार के नकारा प्रशासन को सौंप दूँगा। मेरा दावा है। लटर-पटर से शासन नहीं चलता। दंगा रोकने के लिए कलेजा होना चाहिए”।

गिरिराज सिंह ने ज़हर उगला, “अब सब्र टूट रहा है। मुझे भय है कि हिंदुओं का सब्र टूटा तो क्या होगा?’’ उस पर तेजस्वी यादव ने फौरन फटकार लगाई, “काहे बड़बड़ा रहे हैं, किसी का सब्र नहीं टूटा है। ठेकेदार मत बनिए, हमसे बड़े हिंदू आप नहीं हैं। ये मगरमच्छी रोना रोने से फुर्सत मिले तो युवाओं की नौकरी, विकास और जनता की सेवा की बात करिए”।

15 मई 1993 को पटना के भारतीय नृत्यकला मंदिर में इंटेलेक्चुअल्स को संबोधित करते हुए बिहार के साबिक़ वज़ीरे-आला अब्दुल गफ़ूर ने कहा था, “दुनिया के मुसलमान इस बात को मानते हैं कि अल्पसंख्यकों को पूर्ण सम्मान देकर लालू जी ने पूरे विश्व में बिहार के सर को ऊंचा किया है”।

ज़ी नेटवर्क पर लालू प्रसाद की ज़ाती और सियासी ज़िंदगी पर केंद्रित फ़ारूख़ शेख़ के एक पुराने शो “जीना इसी का नाम है” में चर्चित फ़िल्म निर्देशक महेश भट्ट ने कहा था, “लालू जी के बारे में सिर्फ़ मेरी राय नहीं है, 92-93 में फ़ारूख़ साहब जो मुंबई में हुआ था, उससे आप भी वाकिफ़ हैं, मैं भी वाकिफ़ हूँ, जो हमने नज़ारा देखा था, ख़ून की नदियाँ बही थीं, ऐसै मौक़े पर ये वो शख़्स थे जिसने बिहार में एक दंगा नहीं होने दिया। मैं उस वक़्त से I’m the greatest admirer of this man. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान को अगर किसी व्यक्ति की ज़रूरत है, वो है लालू प्रसाद यादव, क्योंकि सेक्टोरियन वायलेंस को, ये फंडामेंटलिस्ट को रोकने वाला केवल यही व्यक्ति है। ये रुकने वाले हैं नहीं, इनकी बोली ये बोल सकते हैं, और कोई बोल ही नहीं सकता। अगर हिन्दुस्तान को बचाना है, तो इनके हाथ में रेंज दे दीजिए। ये मेरा अनहेज़िटेंट, अनसेंसर्ड, अनएपोलोजेटिक स्टैंड है”।

अक्टूबर, 2017 में 185 देशों की भागीदारी वाले 19वें विश्व युवा-छात्रोत्सव में शिरकत करने के लिए 18 दिनों के रूसी प्रवास पर मैं था। रूस के ओलम्पिक सिटी सोच्चि में यह आयोजन था। मॉस्को व सेंट पीटर्सबर्ग में कुछ दिन गुज़ारते हुए सोच्चि पहुँचा तो मुख़्तलिफ़ तहज़ीब के लोगों से विचार साझा करना दिलचस्प तज़ुर्बा रहा। वहाँ एक रोज़ पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए प्रतिनिधियों के साथ लंच कर रहा था। मुझे बिहारी जानकर ख़ुश होते हुए उन्होंने पूछा - "और, लालूजी का क्या हाल है? सुना है, आपके यहाँ की सरकार उन्हें आजकल बड़ा तंग कर रही है"। यह मक़बूलियत बहुत कम हिन्दुस्तानी नेताओं को मयस्सर हुई है जो दोनों मुल्कों में समान रूप से आम-अवाम में मशहूर हों, और लोग उनकी फ़िक्र करते हों।

मैंने उनसे कहा कि आप लालू जी की खैरियत पूछ रहे हैं, उनकी सलामती की दुआ करते हैं, पर आपको मालूम है कि लालूजी ने आपके सिंध में पैदा हुए एक नेता को समस्तीपुर में गिरफ़्तार किया था? वो ठहाके लगाते हुए बोले, "अडवाणी को"? मैंने कहा, "जी। एक सिंधी होने के नाते आपको बुरा नहीं लगा"? वो बोले, "सच पूछिए, तो इसीलिए हमलोग लालूजी की इज़्ज़त करते हैं कि आडवाणी आग लगाने का काम करते हैं और लालू यादव आग बुझाने का काम करते हैं। अडवाणी जैसे लोग सिंध में पैदा हुए हों कि पेशावर में जनम लिए होते; ऐसे लोग किसी के नहीं होते, इंसानियत के दुश्मन हैं ऐसे नफ़रतगर्द"।

इसके पीछे लालू जी की जीवन भर की कमाई हुई जो पूंजी है, वो है बिना डगमगाए सेक्युलरिज़म की हिफ़ाज़त के लिए चट्टान की तरह अचल-अडिग रहना। एक बिहारी और उससे बढ़कर भारतीय होने के नाते अपने पड़ोसी देश के बाशिंदे की ज़ुबानी यह सुन कर और उनके दिल में धर्मनिरपेक्षता के अग्रिम पंक्ति के सशक्त प्रहरी के लिए इतना अदबो-एहतराम देखकर अच्छा लगा। रूसी धरती पर लालू प्रसाद के प्रति मन ही मन आभार व्यक्त कर रहा था कि सांप्रदायिक सद्भाव क़ायम रख विदेश में सर उठा कर हमें गर्व से बात रखने का अवसर उनकी बदौलत मिल सका!

मैं बारहा कहता हूँ कि देश जब आज़ाद हुआ था, तो गाँधी आज़ादी के जश्न से अलग दिल्ली से दूर बंगाल के नोआखली में दंगा शांत करा रहे थे, हिंदू-मुस्लिम एकता क़ायम करने में लगे थे। वैसे ही लालू प्रसाद 1-अणे मार्ग में मुख्यमंत्री आवास के ऐशो-आराम से दूर दंगा की आशंका या ख़बर सुनते ही चौकन्ने हो जाते थे, और पहुँच जाते थे लोगों की हिफ़ाज़त करने। जब सीतामढ़ी में दंगा भड़का, तो लालू प्रसाद सीएम हाउस में आराम नहीं फरमा रहे थे, बल्कि ख़ुद अह्ले-सुब्ह उठ कर बलवाइयों के बीच पहुंच कर उन्हें शांति, सद्भाव और भाईचारा की सीख दे रहे थे।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि मार्च 1922 में असहयोग आंदोलन के चलते देशद्रोह के आरोप में 6 साल की कारावास की सज़ा हुई गांधी जी को। यर्वदा जेल में उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई, तो सज़ा के 2 साल के अंदर ही जनवरी 1924 में अॉपरेशन के बाद फरवरी, 1924 में उन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने रिहा कर दिया। औपनिवेशिक साम्राज्यवादी सत्ता में भी इतनी शर्म थी कि मानवीय संवेदना के आधार पर वह ट्रीट कर रही थी। मगर, यह असंवेदनशील सरकार कई जानलेवा बीमारियों से घिरे 73 साल के बुजुर्ग मास लीडर लालू प्रसाद के साथ जिस तरह का क्रूर बरताव हुआ, उसे जनता ने देखा.

आज भाईचाराचोरों की जमात लालू प्रसाद को चाराचोर कह रही है। मीडिया से लेके अकेडमिया, ब्युरोक्रसी से लेके जुडिशरी तक में बैठे यथास्थितिवादी लोग नित नया-नया नैरेटिव ढूंढ के लाते रहते हैं और शोषित समाज के पहरुआ को डेमनाइज़ करते रहते हैं। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि आडवाणी, मोदी वगैरह आते-जाते रहते हैं, धर्मनिररपेक्षता के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले गांधी रहेंगे, उसूल के आगे मिट जाने वाले लालू ज़िंदा रहेंगे।

जैसे गाँधी जी कहते थे, "My life is message", वैसे ही लालू जी का जीवन भी अपने आप में संदेश है. लालू के लोग अपने मोहतरम नेता की एक तवाफ कर लेना चाहते हैं. उन्हें देख कर ग़रीबों को क़िस्म की तस्कीन मिलती है, अंदेशे मिटते हैं। मेरा दृढ़ मत है कि बिहार की सियासत में जननेता दो ही शख़्स हुए, एक जननायक कर्पूरी ठाकुर, और दूसरे गुदड़ी के लाल लालू प्रसाद.

लालू जी, आप हमेशा सेहतमंद रहें, ज़ल्द अपनी जनता के बीच एक बार फिर से लौटें, यही कामना है।

- जयन्त जिज्ञासु,

शोधार्थी, जेएनयू,

लेखक, द किंगमेकर,

सदस्य, बिहार राज्य कार्यकारिणी, राजद

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