पटना

पटना एम्स का सर्वे- लॉकडाउन में टीबी मरीजों की दवा में ढील बन गया जान का खतरा

Smart News Team, Last updated: 13/06/2020 05:53 PM IST
  • कोरोना लॉकडाउन में टीबी मरीजों की दवा में ढील उनकी जान के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। पटना एम्स के सर्वे में ये बात कही गई है। 
लॉकडाउन में टीबी मरीजों की दवा में ढील उनकी जान के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ( प्रतीकात्मक फोटो)

पटना. लॉकडाउन में सख्ती हुई तो लोगों का घरों से बाहर निकलना तक बंद हो गया। ऐसे में काफी संख्या में मरीज अपनी बीमारी का ध्यान नहीं रख पाए। अब अनलॉक 1 में ढील तो मिल गई लेकिन जो टीबी के मरीज हैं उन्हें भारी जरूर पड़ गया। दरअसल, टीबी की बीमारी में ढील देने की वजह से मरीजों में दोबारा एमडीआर टीबी का खतरा बढ़ गया। पटना एम्स में किए गए सर्वे में यह बात सामाने आई है।

पटना एम्स के विभाग अध्यक्ष डॉक्टर दीपेंद्र कुमार ने कहा कि सर्वे में कई चौंकाने वाली बात सामने आई हैं। सर्वे में बताया गया कि कोरोना काल में ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवा नहीं मिल पाई जिस वजह से काफी संख्या में मरीज समय से दवाई का सेवन नहीं कर सके। इसी वजह से राज्य के करीब 20 से 24 फीसदी टीबी मरीजों की लॉकडाउन में दवा छूट गई।

डॉक्टर दीपेंद्र कुमार ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान टीबी मरीजों को लगातार दो-तीन दवा नहीं मिलने से भविष्य में एमडीआर टीबी का खतरा बढ़ गया। बता दें कि देश में हर रोज 1200 से 1500 लोग टीबी की बीमारी से मरते हैं जिनमें बिहार के मरीजों की संख्या भी काफी है। मरने वाले ज्यादातर मरीज एमडीआर टीबी के ही शिकार पाए जाते हैं।

क्या है एमडीआर टीबी

डॉक्टर दीपेंद्र ने बताया कि सामान्य टीबी के मरीजों को 6 महीने तक जो दवा दी जाती है, अगर उसका नियमित रूप से सेवन नहीं किया जाए तो यह बीमारी एमडीआर टीबी का रूप ले लेती है। एमडीआर टीबी की एडवांस स्टेज होती है जिसमें सामान्य दवाइयां काम नहीं करती. साथ ही इसमें दवा का डोज भी बढ़ जाता है और इसका कोर्स 6 महीने की जगह 2 साल तक चलता है।

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