पटना में छप रहीं नकली किताबें

Malay, Last updated: Sat, 29th Jun 2019, 12:06 AM IST
शहर में नकली किताबें छापे जाने का बड़ा मामला सामने आया है। कसाई टोला के पास एक अवैध प्रिंटिंग पे्रस में हजारों सरकारी किताबें छापी जा रही थीं। ये किताबें रद्दी कागज पर तैयार हो रही थीं। नकली किताबों...
कुछ इस तरह छाप कर रखीं जा रहीं थीं नकली किताबें।

शहर में नकली किताबें छापे जाने का बड़ा मामला सामने आया है। कसाई टोला के पास एक अवैध प्रिंटिंग पे्रस में हजारों सरकारी किताबें छापी जा रही थीं। ये किताबें रद्दी कागज पर तैयार हो रही थीं। नकली किताबों पर कीमत वही दर्ज है, जो सरकारी किताबों पर है, जबकि इनको बनाने में आधे से भी कम लागत आ रही है। इन नकली किताबों से अवैध प्रिंटिंग प्रेस को करोड़ों रुपए का फायदा हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन किताबों में जिस तरह के कागज का उपयोग किया जा रहा है, उससे यह किताबें तीन माह में ही फट जाएंगी। 

सरकारी स्कूलों में अब मुफ्त किताबें नहीं मिलतीं। सरकार बच्चों के खाते में किताबों का पैसा भेजती है। जब से यह नियम बदला है, तभी से नकली किताबों का कारोबार भी शुरू हो गया है। बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन ने बिहार में 48 प्रिंटिंग प्रेस को सरकारी किताबें छापने के लिए अधिकृत कर रखा है। मानक भी तय किए गए हैंं। एक प्रकाशक को तीन विषयों की किताब छापने की अनुमति दी जाती है। पांचवीं के गणित की सात लाख किताबें छापने की जिम्मेदारी पटना के भारत प्रिटिंग प्रेस को मिली है। गुरुवार रात को इस प्रेस के मालिक को सूचना मिली कि कसाई टोला के पास अनधिकृत तरीके से सबीना ऑफसेट नाम के प्रिंटिंग प्रेस में सरकारी किताबें छापी जा रही हैं तो वे शुक्रवार सुबह मौके पर पहुंच गए। वहां हजारों नकली किताबों का ढेर लगा था। इसकी सूचना उन्होंने बहादुरगंज थाना को दी। अवैध प्रिंटिंग प्रेस का मालिक फरार है।

एक करोड़ बच्चों के लिए छपती हैं किताबें
बिहार के सरकारी स्कूलों में लगभग एक करोड़ बच्चे पंजीकृत हैं। इनके लिए 5 करोड़ किताबें हर साल छपती हैं। कीमत, मानक और प्रिटिंग प्रेस बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक कॉरपोरेशन ही तय करता है। सरकारी किताबों में 70 ग्राम के कागज और 170 ग्राम के कवर लगाना अनिवार्य है। समय-समय पर इसकी जांच भी होती रहती है। 

रद्दी कागज पर तैयार हो रहींं नकली किताबें
रद्दी कागज से नकली किताबेंं तैयार की जा रही है। इनमें 54 ग्राम से भी कम का कागज उपयोग हो रहा है। जिसके कारण प्रकाशक को दोगुना फायदा होता है। एक नकली किताब पर आसानी से 20-30 रुपए की बचत होती है। इस तरह अगर एक लाख किताबें भी बाजार में बिक गईं तो सीधे अवैध प्रकाशक को 20-30 लाख की काली कमाई हो जाती है।

नकली किताब छापकर करोड़ों की कर रहे कमाई 
भारत प्रिटिंग प्रेस के मालिक अरुण कुमार सिन्हा का कहना है कि सरकारी स्कूलों में गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे में हमें यह जिम्मेदारी दी जाती है कम कीमत और कम बचत में अच्छी किताब दे। हमारी किताबें बाजार में कोई ले ही नहीं रहा था, तब मुझे शक हुआ और मैंने खुद से जांच की और नकली किताबों की प्रेस सामने आई। 

शहर में नकली किताबें छापी जा रही हैं। यह मामला मेरे संज्ञान में आया है। मैंने एसएसपी को पत्र लिखकर जांच करने का अनुरोध किया है। पुलिस प्रशासन अपने स्तर पर जांच कर कार्रवाई करेगा। 
-अरविंद कुमार वर्मा, एमडी, बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन

नकली किताब छापे जाने की शिकायत मिली है। मौके पर जाकर प्रिंटिंग पे्रस पर छापा भी मारा गया, लेकिन प्रेस बंद मिला।  अनुसंधान चल रहा है।
-महेश कुमार, थाना प्रभारी, बहादुरपुर थाना

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