विधानसभा चुनाव: यूपी की लड़ाई ने एक ना होने दिए बिहार में दो गठबंधन

Smart News Team, Last updated: 10/10/2020 12:57 PM IST
  • बिहार विधानसभा चुनावों में यूपी की दलित राजनीति का रंग दिखाई दे रहा है. जिसके चलते ही दो गठबंधन एक नहीं हो सके.
रालोद प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा, बसपा सुप्रीमो मायावती

पटना, राजकुमार शर्मा:  भारत में चुनावों में जातिगत समीकरणों की चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता और जब बात बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की हो तो ये चर्चा और भी दिलचस्प हो जाती है. हाल ही में होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनावों पर यूपी के दलित वोट बैंक की लड़ाई का असर साफ दिख रहा है. इस लड़ाई ने ही राज्य में नए बने दो चुनावी गठबंधनों को एक नहीं होने दिया. दरअसल उत्तर प्रदेश में दलितों की पार्टी कही जाने वाली बसपा के वीटो के चलते ही बिहार में यहां रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और जाप के अध्यक्ष पप्पू यादव के बीच बातचीत का कोई परिणाम नहीं निकला. दरअसल उपेंद्र की पार्टी का गठबंधन बसपा तो पप्पू यादव चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी से है. इन दोनों दलों के बीच यूपी में छत्तीस का आंकड़ा है. अब चंद्रशेखर की नजर बिहार में बसपा के वोट बैंक पर है। बसपा सुप्रीमो मायावती की बीते दो

दशक से अधिक समय से यूपी के दलित वोट बैंक पर धाक रही है। इसी के बूते दूसरी जातियों संग सोशल इंजीनियरिंग से मायावती कई बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। भीम आर्मी बनाकर चर्चा में आए चंद्रशेखर आजाद ने बीते कुछ समय में उनके सामने चुनौती पेश की है। चंद्रशेखर को लोग रावण उपनाम से भी जानते हैं करीब सालभर पहले राजनीतिक दल बनाकर

बाद बिहार में दलित राजनीति बदल गई है. इसके लिए उन्हें पासवान के साथ रविदास बिहार में दलितों का नया नेता कौन होगा, और मुसहरों का भी समर्थन जुटाना होगा. इसके लिए चुनाव परिणाम तक इंतजार करना क्योंकि, दलितों में 70 फीसदी से अधिक यह होगा. क्योंकि, इस बार दलित मतदाता चुनाव तीनों जातियां हैं. पिछले दो विधानसभा चुनाव के केंद्र में हैं. पचास साल बाद यह पहला में लोजपा को दो-तीन सीट मिलती रही है। चुनाव है, जिसमें दलित राजनीति का बड़ा वर्ष 2010 में पार्टी को तीन सीट के साथ चेहरा नहीं होगा. लोजपा अध्यक्ष चिराग करीब सात फीसदी वोट मिला था. जबकि पासवान अकेले चुनाव मैदान में उतर चुके हैं. 2015 में दोसीट और पांच फीसदी वोट मिला उनकी नजर दलित वोटों पर है. राजनीति में था जबकि लोकसभा में भाजपा और जेडीयू उनका मुकाबला करने के लिए मुख्यमंत्री के साथ चुनाव लड़कर लोजपा आठ फीसदी नीतीश कुमार ने भी अशोक चौधरी और वोट और छह सीट जीतने में सफल रही थी. जीतन राम मांझी को आगे किया है. ऐसे में चिराग की राह आसान नहीं है. लोजपा महागठबंधन की नजर भी 16 फीसदी दलित के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बिहार में वोटों पर है. चुनाव के बीच रामविलास करीबडेढ़ दर्जनसीट पर पासवान मतदाताओं पासवान के निधन से चिराग की चुनौतियां बढ़ी की संख्या काफी अधिक है.

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राजनीति में उतरे चंद्रशेखर ने बिहार चुनाव में भी दस्तक दे दी है. उनके लिए यह चुनाव 2022 के यूपी के संग्राम से पहले का लिटमस टेस्ट साबित होगा. इन दोनों की कड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ही रालोसपा और जाप की अगुवाई वाले दोनों गठबंधन की दोस्ती में गांठ बन गई. रालोसपा और जाप के नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही. जिस दिन उपेंद्र कुशवाहा ने बसपा संग नए गठबंधन की घोषणा की थी, उससे ठीक पहले भी बंद कमरे में उनकी पप्पू यादव से काफी देरबात हुई थी. दरअसल बसपा किसी भी सूरत में ऐसे किसी गठबंधन का हिस्सा बननेको तैयार नहीं है, जिससे चंद्रशेखर काजुड़ाव हो. उधर, चंद्रशेखर भी बसपा सुप्रीमो मायावती को घेरने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते.

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