किशनगंज SP कुमार आशीष IPS ने 54 फ्रेंच भाषाई देशों में फैलाया महापर्व छठ का बखान

Smart News Team, Last updated: 20/11/2020 05:12 PM IST
  • बिहार के महापर्व छठ पूजा की महिमा का बखान किशनगंज के एसपी और आईपीएस अधिकारी कुमार आशीष ने एक लंबे शोध में किया है जिसे फ्रेंच भाषा की किताब में जगह मिली है. इस लेख के जरिए छठ का बखान 54 ऐसे देशों तक पहुंचा है जहां फ्रेंच बोला जाता है.
आईपीएस कुमार आशीष. इन्होंने 54 फ्रेंच भाषाई देशों के लिए एक किताब में बिहार के महापर्व छठ की महिमा का शोधपूरक बखान किया है.

कुमार आशीष, आईपीएस
एसपी, किशनगंज

आस्था का महापर्व छठ की महिमा निराली है. ये त्योहार सदियों से बिहारवासियों के मन में अपनी मिटटी और संस्कृति के प्रति लगाव और महान आस्था का संगम है. यह पर्व उन तमाम बिहार वासियों के लिए और खास हो जाता है जो इस वक्त देश-विदेश के किसी और हिस्से में होते हैं. ऐसी ही कुछ निराली बात बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी कुमार आशीष के साथ 2006-2007 में यहां से 9000 किलोमीटर दूर फ्रांस में हुई थी.

बिहार के जमुई जिला निवासी आईपीएस अधिकारी कुमार आशीष 14 साल पहले फ्रांस में स्टडी टूर पर गए थे. वहां एक संगोष्ठी में फ्रेंच लोगों ने उनसे बिहार के बारे में कुछ रोचक और अनूठा बताने को कहा तो उन्होंने महापर्व छठ के बारे में विस्तार से समझाया.

फ्रेंच काफी प्रभावित हुए. उन्होंने कहा कि इस विषय पर फ्रांस के साथ-साथ फ्रेंच बोलने-समझने वाले अन्य 54 देशों तक भी इस पर्व की महत्ता का पावन संदेश पहुंचाना चाहिए. भारत लौटने के बाद आशीष ने इस पर्व के बारे में और गहन अध्ययन एवं बारीकी से शोध कर छठ पर्व को पूर्णत: परिभाषित करने वाला एक लेख "Chhath Pouja: l'adoration du Dieu Soleil" लिखा जो कि भारत सरकार के अंग भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) दिल्ली के द्वारा फ्रेंच भाषा में "rencontre avec l'Inde" नामक किताब में 2013 में प्रकाशित हुई.

छठ पर कुमार आशीष के लेख में क्या है ?

इस लेख में कुमार आशीष ने छठ महापर्व के सभी पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण कर फ्रांसीसी भाषा के लोगों के लिए महापर्व की जटिलताओं को समझने का एक नया आयाम दिया है. शुरुआत में वे बताते हैं कि छठ मूलत: भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है. चार दिनों के इस पर्व में कठोर धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आचारिक-व्यावहरिक शुद्धता रखी जाती है.

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छठ शब्द सिर्फ दिवाली के छठे दिन का ही द्योतक नहीं है बल्कि ये इंगित करता है कि की प्रखर किरणों की सकारात्मक ऊर्जा को हठ योग के छह अभ्यासों के माध्यम से एक आम आदमी कैसे आत्मसात कर सभी प्रकार के रोगों से मुक्त हो सकता है. इस पर्व के हर छोटे से छोटे विधान की योगिक और वैज्ञानिक महत्ता है. मसलन, साल में दो बार क्यों मनाया जाता है यह पर्व ? सूर्य की उपासना के वक़्त जल में खड़े रहने का आधार है ? डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे का विचार क्या है ? सूप और दौरे का छठ पूजा में क्या महत्व है ? यह पूजा ऋग्वेद काल से शुरू हुई, महाभारत में धौम्य ऋषि के कहने पर द्रौपदी ने पांडवों के साथ छठ कर सूर्य की कृपा से अपना खोया राज्य और वैभव वापस प्राप्त किया था. बिहार में इसका प्रचलन सूर्यपुत्र अंगराज कर्ण से शुरू माना जाता है.

छठ में मूर्ति पूजा नहीं

छठ पूजा बिहार के प्रसिद्ध पर्वों में से एक है. छठ पर्व, छठ या षष्‍ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है. सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है. इन इलाकों से रोजी-रोजगार के लिए निकले लोगों की वजह से आजकल इसका स्वरूप वैश्विक हो चला है. मुंबई, दिल्ली, भोपाल, बेंगलुरू, मॉरीशस, अमेरिका, कनाडा समेत कई स्थानों से इस पावन पर्व को मनाने की खबर आती रहती है. प्रायः हिन्दुओं द्वारा मनाए जाने वाले छठ पर्व को दूसरे धर्मावलंबी भी मनाते देखे गये हैं. धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है. छठ पूजा सूर्य और उनकी बहन छठी म‌इया को समर्पित है ताकि उन्हें पृथ्वी पर जीवन की देवतायों को बहाल करने के लिए धन्यवाद और कुछ शुभकामनाएं देने का अनुरोध किया जाए. प्रारंभ में छठ में कोई मूर्तिपूजा शामिल नहीं थी. कालांतर में सूर्यदेव तथा छठी मैय्या की मूर्तियों का प्रचलन भी शुरू हो चुका है .

छठ महापर्व के कठोर अनुष्ठान और व्रत

त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं. इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है. परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं. हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है. कुछ भक्त अपने घर से तालाब-नदी के किनारों के लिए आपादमस्तक लेटते हुए “दंड देते” हुए भी करते हैं.

छठ महापर्व की पौराणिक कथा और मान्यता

मान्यता है कि देव माता अदिति ने भी छठ पूजा की थी. एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी. तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था. इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई. कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया.

भारत में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ. मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है. यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है. स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं. छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. उनकी मनोकामना पूरी हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिला. लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है. लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.

छठ महापर्व पर वैज्ञानिक दृष्टकोण

छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय बदलाव होता है. इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (Ultra Violet Rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है. पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है. पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है. सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं. सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुंचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है. वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है. पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है. इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है. पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है. सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है. अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है.

छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं. वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरांत आती है. ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है. छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है. इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं. इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते. आइये इसके विभिन्न चरणों को जानते हैं:

छठ महापर्व में नहाय खाय का महत्व

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रति के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. यह दाल चने की होती है. भोजन बनाने के लिए सेंधा नमक और सात्विक चीजों का प्रयोग किया जाता है.

छठ महापर्व में लोहंडा और खरना का महत्व

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बनी चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं होता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस भोजन के उपरान्त व्रती का 36 घंटों का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है.

छठ महापर्व में संध्या अर्घ्य का महत्व

अनुष्ठान के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, पीसे हुए चावल के लड़ुआ, कचमनिया इत्यादि बनाते हैं. इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया चीनी का बना हुआ सांचा और विभिन्न प्रकार के स्थानीय फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होते हैं. शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सभी छठव्रति तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है, इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले जैसा दृश्य बन जाता है. हाल के दिनों में नदी और तालाब से दूरी की वजह से आस-पास खाली जमीन पर गड्ढ़ा बनाकर उसे पानी से भरकर भी ऐसा किया जाता है. कुछ लोग अपने घर की छतों पर कुंड बना लेते हैं और उसमें पानी भरकर सूर्य की उपासना करते हैं.

छठ महापर्व में प्रात:कालीन अर्घ्य का महत्व

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रति वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहां उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है. सभी व्रति तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं. व्रति घर वापस आकर पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहां जाकर पूजा करती हैं. पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं.

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है. यह व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है. काफी पुरुष भी इस व्रत को रखते हैं. व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है. चार दिनों के इस व्रत में व्रति को लगातार उपवास करना होता है. भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है. पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रति फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं. इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नये कपड़े पहनते हैं. जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गयी होती है. व्रति को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है. महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं. छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए. घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है.

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है. पुत्र-पुत्री की चाहत रखने वाली और संतान-परिजन की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं. पुरुष भी निष्ठा से अपने मनोवांछित कार्य को सफल होने के लिए व्रत रखते हैं. लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं.

आज के परिवेश में छठ पर्व की सार्थकता 

वृक्ष चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, चाहे कितनी भी दूर उसकी शाखाएं क्यों न फैल जाए, उसको पोषण उसकी जड़ों से ही मिलता है. और जिस दिन कोई वृक्ष अपनी जड़ों से कट जाता है तो फिर उसे गिरते देर नहीं लगती. हम इंसान भी वृक्षों की तरह ही होते हैं. चाहे हम अपनी जन्मभूमि से कितना भी दूर हो जाएं, हम को जीने की ताकत, अपनी कर्मभूमि में कर्मपथ पर टिके रहने की जिजीविषा उस मिट्टी, उन जड़ों से ही मिलती हैं जहाँ हमने अपना बचपन गुजारा होता है. बचपन के संस्कार ही मनुष्य के जीवन भर की आदतें बन जाती हैं और बचपन के त्योहार ही उसके जीवन भर की सौगातें. यही कारण है कि साल में जब जब ये त्योहार आते हैं, तो फिर इंसान चाहे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो, उसे अपने घर की याद और घर जाने की इच्छा होने लगती है.

छठ महापर्व है. आस्था का महापर्व. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए सबसे बड़ा पर्व. फिर चाहे वो दिल्ली एनसीआर या सूरत में साल भर खटने वाला मजदूर हो या बेंगलुरू के किसी ऑफिस में काम करने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सबके मन में ये इच्छा होती है कि छठ में तो घर जाना ही है. आखिर क्या है ये छठ. क्यों है ये इतना महत्वपूर्ण. न हीं कभी करवा चौथ की तरह किसी बॉलीवुड फिल्म में इसे दिखाया गया है, न ही मीडिया में इसके बारे में चर्चा होती है. ना ही इसमें कोई बड़ा आयोजन होता है, ना ही ताम झाम के साथ जुलूस निकाला जाता है. न हीं इसकी कोई व्रतकथा की किताब होती है. ना ही किसी प्रसिद्ध ऐतिहासिक या धार्मिक किताब में इसका विस्तृत विवरण है. लेकिन इन सबके बावजूद हर पूरबिया के लिए भावनात्मक आलंब और उसकी पहचान है ये छठ. आखिर क्या विशेष है इस पर्व में ? क्या है ये छठ ? आइये थोड़ी कोशिश करते हैं इसे समझने की, शायद हमें कुछ विशेष बातें समझ मे आ जाए.

वास्तव में छठ दिखाता है मनुष्य की कृतज्ञता की भावना को. ये दिखाता है कि किसी के उपकार हम नहीं भूलते. हम इसी लिए सूर्य को अर्घ्य देते हैं कि हे सूर्यदेव आप हमें जीवनदायिनी प्रकाश देते हैं. आपके प्रकाश और ऊष्मा से ही हमारी पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व है. इसलिए वर्ष में एक दिन ही सही, हम आपका पूजन करते हैं. आपको अर्घ्य देते हैं और आपके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं.

इसके अलावा छठ पर्व इस लिए भी महान पर्व कि इसमें कोई पुरोहित और यजमान नहीं होता. सभी बस व्रती ही होते हैं, बस छठ-व्रती. समानता का ऐसा शंखनाद कोई और पर्व करता हो, मुझे तो नहीं पता. यही कारण है कि छठ के घाट पर सब एक साथ अर्घ्य देते है. ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा की ये पहले अर्घ्य देंगे और वो बाद में. एक-दूसरे के सूप में लोग अर्ध्य देते हैं.

छठ व्रत की एक बड़ी खासियत ये है कि प्रकृति पूजन के साथ साथ ये महापर्व सबको अपने आप में समाहित करता है. दउरा और सूप बनाने वाले लोगों को भी छठ महत्व देता है. हमे याद दिलाता है कि ये लोग भी सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग हैं. और मनुष्य ही क्यों, गागर नींबू और सुथनी जैसे परित्यक्त फलों को भी छठ महत्व देता है. छठ व्रत में अंगूर, अनार, कीवी, स्ट्राबेरी जैसे महंगे और आम आदमी से दूर रहने वाले फलों की कोई जरूरत नहीं. घर के आंगन में उग गए नींबू, आंवला और अमरूद से ही छठ मैया की पूजा हो जाएगी.

पूर्ण शुचिता का ध्यान रखना अत्यावश्यक होता है. इसके अलावा आप अमीर हों या गरीब , अगर आपको व्रत करना है तो आपको अपने हाथ से अपना प्रसाद बनाना होगा. आप को खुद अपनी रसोई साफ करनी होगी, खुद अपना गेहूं धोकर सुखाना होगा और खुद अपने से प्रसाद का ठेकुआ बनाना होगा. भले ही आप मंगवा सकते हों बाजार से हजारों की मिठाइयां, छठ में आपको अपने हाथ का बना ठेकुआ ही चढ़ाना होगा.

लेकिन छठ सिर्फ इतना ही नहीं है. इसके अलावा भी बहुत कुछ है. ये एक धार्मिक आयोजन नहीं, एक सामाजिक जरुरत है. बिहारी डायस्पोरा जो आज एक बहुआयामी और सशक्त समुदाय के रूप में उभर चुका है, जिसके लोग संसार के कोने-कोने में फैले हुए हैं. जिनकी पहचान बिहारी अस्मिता छठ से जुडी हुई है. इसके मधुर कर्णप्रिय लोक गीतों से- शारदा सिन्हा की सुरीली आवाज़ से जुडी हुई है. ये लोकगीत हमें बिहार की मिटटी की याद दिलाते हैं, घर के सभी सदस्यों की उपस्थिति में एक परिवार- समाज में होने का अहसास दिलाते हैं. ये आवश्यक है हर उस आदमी के लिए, जो रोजी रोटी की तलाश में घर से हजारों किलोमीटर दूर पसीने बहा रहा होता है और सोचता है कि छठ में घर जाएंगे. छह महीने पहले ऑफिस में छुट्टी का आवेदन देता है, तीन-चार महीने पहले रेल टिकट का रिजर्वेशन करवाता है. ये आस है हर उस मां-बाप के लिए, जिसे अपने बेटों-बेटियों को देखे महीनों हो जाते हैं और वो इस उम्मीद में रहती हैं कि छठ में तो बेटा-बेटी घर आएंगे ही. इसी आस में घर-द्वार की रंगाई-पुताई-सफाई भी करवाते हैं. ये छठ विश्वास है हमारी नई पीढ़ी के उन बच्चों के लिए, जो शहर के एकाकी अपार्टमेंट में जीते हैं और जिन्होंने नदी और पोखर को सिर्फ किताबों और टीवी में देखा है. जल ही जीवन है, जल है तो कल है- ये पर्व हमें सदियों से सिखा रखा है. इस पर्व की आवश्यकता साधना और भरोसे की उस परम्परा को जिन्दा रखने के लिए भी है जो स्त्री-पुरुष में समानता की वकालत करता है. छठ ये इंगित करता है कि बिना पंडित-पुरोहित भी पूजा हो सकती है. ये इकलौता अनुष्ठान है जिसमें सिर्फ उगते सूरज को नहीं बल्कि डूबते सूरज को भी नमन किया जाता है. ये छठ अनिवार्य है आपके लिए, मेरे लिए, हम सबके लिए, जो छठ के बहाने घाट पर गांव भर के लोगों से मिलकर प्रणाम-पाती और हालचाल तो कर लेते हैं. सामाजिक ताने-बाने और रिश्तों को जीवित रखने के लिए छठ आवश्यक है और बहुत आनंददायक है .

कौन हैं कुमार आशीष 

कुमार आशीष भारतीय पुलिस सेवा के 2012 बैच के बिहार कैडर के अधिकारी हैं और वो मधेपुरा तथा नालंदा में एसपी के रूप में अपनी सेवा दे चुके हैं. वर्तमान में किशनगंज के एसपी के रूप में जनता के लिए कार्यरत हैं. आशीष सामुदायिक पुलिसिंग के प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. उनके शुरू किए कई प्रोग्राम जैसे कॉफ़ी विथ एसपी, पिंक-पेट्रोलिंग, हॉक-मोबाइल पोलिसिंग, थाना-दिवस, मिशन वस्त्रदान, पर्यटक मित्र पुलिसिंग योजना काफी लोकप्रिय रहे हैं और अपराध नियंत्रण में कारगर भी सिद्ध हुए हैं. उन्हें सामूहिक बलात्कार के एक मामले के त्वरित अनुसंधान और स्पीडी ट्रायल से 07 दोषियों को आजीवन कारावास दिलाने के लिए देश का प्रतिष्ठित केंद्रीय गृहमंत्री अनुसंधान पदक से नवाज़ा गया है. ऐसा सम्मान पाने वाले वे बिहार के पहले आईपीएस अधिकारी हैं. उन्होंने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) से फ्रेंच भाषा में स्नातक, पीजी और पीएचडी भी किया है. पुलिसिंग के साथ पठन-पाठन और लेखन में रूचि है और अब तक विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर उनके कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं.

डिस्क्लेमर: यह आलेख हिन्दुस्तान स्मार्ट के लिए कुमार आशीष ने लिखा है. इस आलेख के सारे अंश, विचार, तथ्य पर उनका ही कॉपीराइट है. 

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