Dussehra 2021: रावण कैसे बना दशानन ? जानें 10 सिरों का रहस्य और मायने

Pallawi Kumari, Last updated: Fri, 15th Oct 2021, 11:19 AM IST
  • दशहरा का त्योहार असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इस दिन कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ रावण के दस सिर वाले पुतले का दहन किया जाता है. कहा जाता है कि रावण के दस सिर थे . रावण के हर सिर के अलग अलग रहस्य और मायने हैं. आज दशहरे के दिन जानते हैं रावण के दशानन बनने की कहानी.
दशानन रावण के 10 सिरों का रहस्य.

अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि में दशहरा का त्योहार मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार आज के दिन ही मर्यादापुरुष भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था. इसलिए ये त्योहार शक्ति- मर्यादा और सत्य-असत्य का प्रतीक माना जाता है. दशहरा के दिन 10 सिर वाले रावण के पुतले का दहन किया जाता है. रावण दहन के दिन बच्चों से लेकर बड़े तक सभी के मन में से सवाल जरूर होता है कि क्या सच में रावण के दस सिर थे. 

पौराणिक मान्यता के अनुसार रावण के दस सिर थे इसलिए उन्हें दशानन भी कहा जाता है. इतना ही नहीं रावण के हर सिर के अलग अलग रहस्य और मायने भी हैं. कहा जाता है कि रावण के दस सिर दस बुराइयों का प्रतीक है. आइये आज दशहरा के दिन जानतें रावण के दस सिर से जुड़ी बातें.

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रावण के दस सिर में दस बुराईयां- बुजुर्गों का कहना है कि रावण के दस सिर दस बुराईयों का प्रतीक हैं. काम, क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष, घृणा, पक्षपात, अहंकार, व्यभिचार, धोखा ये सभी रावण के दस सिरों के रूप में दर्शाए गए हैं.

रावण कैसे बना दशानन- कहा जाता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने सालों तपस्या की थी. लेकिन फिर भी रावण की कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए. तब रावण ने अपना सिर भगवान को अर्पित करने का फैसाल ले लिया. रावण शिव भक्ति में इतना लीन हुआ कि उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए अपना सिर काटकर उन्हें अर्पित कर दिया. सिर काटने के बाद भी उसकी मृत्यु नहीं हुई. वह सिर काटता गया और एक के बाद एक दूसरा सिर आता गया. इस तरह रावण ने अपने 9 सिर को काटकर शिव को अर्पित कर दिए. 

लेकिन जैसी ही रावण ने अपना दसवां सिर काटकर भगवान को अर्पित करना चाहा तभी वहां शिव प्रकट हुए. भगवान शिव रावण की भक्ति और कठोर तपस्या से खूब प्रसन्न हुए. उन्होंने रावण को अपना परम भक्त कहा और दशानन होने का वरदान दिया. भगवान शिव ने साथ ही ये भी वरदान दिया कि रावण की मृत्यु तबतक नहीं होगी जब तक कोई उसकी नाभि पर प्रहार नहीं करता. इस तरह प्रभु राम ने विभीषण के कहने पर प्रभु राम ने रावण की नाभि में बाण मारा तब जाकर रावण की मृत्यु हुई.

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