हरतालिका तीज का व्रत पति के सौभाग्य के लिए, जानें क्या है व्रत कथा

Smart News Team, Last updated: 20/08/2020 07:37 PM IST
  • हरतालिका तीज सुहागने अपने पति के सौभाग्य के लिए रखती हैं. माता पार्वती ने भगवान शिव की दीर्घ आयु और सौभाग्य के लिए इस व्रत को किया था.
सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए तो कुंवारी कन्याएं अच्छा वर पाने के लिए हरतालिका तीज का व्रत रखती है।

पटना. हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को किया जाता है.लिंग पुराण की कथा के अनुसार शिवजी ने पार्वती जी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के महात्म्य की बात कही थी. उन्होंने देवी पार्वती से कहा कि एक बार जब तुमने हिमालय पर्वत पर जाकर गंगा किनारे मुझे पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या प्रारंभ प्रारंभ की थी. उसी घोर तपस्या के समय नारद जी तुम्हारे पिता के पास गए और उनसे कहा कि भगवान विष्णु आपकी कन्या के साथ विवाह करना चाहते हैं. इस कार्य के लिए उन्होंने मुझे भेजा गया है. नारद जी की यह बात को सुनकर तुम्हारे पिता ने इसे स्वीकार कर लिया.

 नारद जी के जाने के बाद तुम्हारे पिता ने तुम्हें भगवान विष्णु के साथ निश्चित किया गए विवाह संबंध के बारे में बताया. यह बात सुनकर तुम अत्यंत दुखी हुई और जोर-जोर से रोने लगी। जब तुमसे तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारे रोने का कारण पूछा तो तुमने उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया। तुमने कहा कि "मैं इधर भगवान शंकर के साथ विवाह करने की कठिन तपस्या प्रारंभ कर रही हूं और इधर हमारे पिताजी विष्णु के साथ हमारा संबंध करना चाहते हैं. यदि तुम मेरी सहायता कर सको तो बोलो.अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगी"

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तब सखी ने तुम्हें सांत्वना देते हुए कहा कि मैं तुम्हें एक ऐसे वन में ले चलूंगी जिसके बारे में तुम्हारे पिता को भी तुम्हारा पता भी नहीं चल सकेगा. इस प्रकार तुम्हारी सखी तुम्हें एक घने जंगल में ले गई. इधर तुम्हारे पिता  तुम्हें घर में नहीं पाकर बहुत चिंतित हुए क्योंकि उन्होंने नारद से विष्णु के साथ तुम्हारे विवाह के लिए स्वीकृति दे दी थी. वचन भंग की चिंता ने उन्हें मूर्छित कर दिया. तब सभी यह जानकर तुम्हारी खोज में लग गए. 

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उधर सखी सहित तुम नदी किनारे एक गुफा में मेरे नाम की तपस्या करने लगी. भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को उपवास रखकर मिट्टी का शिवलिंग स्थापित करके उसकी पूजा की और रात्रि में जागरण भी किया. तुम्हारे कठिन व्रत ने मुझे विवश कर दिया. इससे मुझे तुरंत तुम्हारे पूजा स्थल पर आना पड़ा. तुम्हारी मांग और इच्छा के अनुसार तुमको मुझे अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करना पड़ा. उसके बाद मैं तुरंत कैलाश पर्वत पर आ गया. प्रातः बेला में जब तुम पूजन सामग्री नदी में छोड़ रही थी. उसी वक्त तुम्हारे पिता भी उसी स्थान पर पहुंच गए. वे तुम दोनों को देख कर रोते हुए पूछने लगे बेटी! तुम यहाँ कैसे आ गई? तब तुमने तुम्हारे पिता को विष्णु विवाह वाली बात बता दी. वे तुम्हारी ज़िद को पूरा करने के वादे के साथ तुम्हें घर ले लाए. तब शास्त्र विधि से तुम्हारा मेरे साथ विवाह हुआ.

 

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