Pitru Paksha 2021: इन तीन चीजों के बिना अधूरे रह जाते हैं श्राद्ध कर्म, जरूर करें शामिल

Priya Gupta, Last updated: Thu, 23rd Sep 2021, 8:55 AM IST
  • शुद्ध पितृपक्ष 21, सितबंर से शुरु हो चुकी है. हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है. किसी भी व्यक्ति की कुंडली में अगर संतान श्राप पिृत दोष से मुक्ति पाने के लिए महालय यानी श्राद्ध पक्ष श्रेष्ठ उपाय है.
Pitru Paksha 2021:

पितृपक्ष पूर्णिमा यानी कि 21, सितबंर से श्राद्ध की शुरुआत हो चुकी है. हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है. किसी भी व्यक्ति की कुंडली में अगर संतान श्राप पिृत दोष से मुक्ति पाने के लिए महालय यानी श्राद्ध पक्ष श्रेष्ठ उपाय है. श्राद्ध कर्म के दौरान तीन चीजों के बिना श्राद्ध प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है. शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्ता को तर्पण आदि करते समय कुश, तिल और तुलसी का प्रयोग जरूर करना चाहिए. शास्त्रों में कहा गया है कि ऐसा करने से पितृ को तृप्ती मिलती है और इससे वंशजों का आर्शिवाद मिलता है.

कुश- शास्त्रों में कहा गया है कि कुश भगवान विष्णु का अहम हिस्सा है. सनातन धर्म में कुश को सबसे शुद्ध माना गया है. इसलिए श्राद्ध के दौरान कुश को शामिल करना चाहिए. इससे पूजा शद्ध होती है.धार्मिक मान्यता है कि कुश की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई है. कहा जाता है कि इसे धारण करके तर्पण करने से पितर की आत्मा को बैकुंठ की प्राप्ति होती है.

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तिल- श्राद्ध के दौरान तिल का उपयोग करना जरूरी होता है. क्योंकि तिल की उत्पत्ति भी विष्णु जी से हुई है. कहते हैं कि तिल की उत्पत्ति पसीने से हुई है. ऐसे में पिंडदान के समय तिल का प्रयोग करने से पितर को मोक्ष की प्राप्ति होती है. काले तिल का इस्तेमाल शुभ माना जाता है. विष्णु जी को काले तिल प्रिय होने के कारण ही इसे तर्पण में प्रयोग किया जाता है.

तुलसी- ऐसा माना जाता है कि तुलसी कभी बासी या अपवित्र नहीं होती. इसलिए एक दिन चढ़ाई गई तुलसी को दोबारा प्रयोग में लाया जा सकता है. पौराणिक कथा के अनुसार श्राद्ध कर्म के दौरान तुलसी का प्रयोग करने से पितर प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को आर्शीवाद देते हैं. साथ ही उनकी आत्मा अंनतकाल के लिए तृप्त हो जाती है.

 

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