नहाय-खाय के साथ लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व छठ शुरू

ABHINAV AZAD, Last updated: Mon, 8th Nov 2021, 7:42 AM IST
  • लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व डाला छठ सोमवार से नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया. इस पर्व पर संतान की सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना के लिए सूर्यदेव और छठी मइया की आराधना की जाती है.
छठ महापर्व के मद्देनजर प्रयागराज के घाटों पर विशेष तैयारी की जा रही है.

प्रयागराज. नहाय खाय के साथ ही लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व डाला छठ शुरू हो गया. लोक आस्था के इस महापर्व पर संतान की सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना के लिए सूर्यदेव और छठी मइया की आराधना की जाती है. नहाय खाय के साथ सोमवार से इसकी शुरूआत हुई. इस दिन व्रती लोग स्नान कर नए वस्त्र धारण कर पूजा के बाद चना दाल, कद्दू की सब्जी को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करेंगे.

नौ नवंबर यानी मंगलवार को खरना के दिन से 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होगा. पर्व को लेकर प्रयागराज में घर से घाट तक तैयारियां शुरू हो गई हैं. प्रयागराज में पूजन समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले साल कोरोना संक्रमण के कारण बड़ी संख्या में व्रती लोगों ने घर पर ही पूजन-अर्चन कर अर्घ्य दिया था. लेकिन इस बार कोरोना का असर कम होने से घाटों पर व्रती लोगों की भीड़ उमड़ेगी. इस बाबत घाटों पर बेहतर तैयारी का इंतजाम किया जा रहा है.

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कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन घर में पवित्रता के साथ कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें ठेकुआ खासतौर पर प्रसिद्ध है. सूर्यास्त से पहले सारे पकवानों को बांस की टोकरी में भड़कर निकट घाट पर ले जाया जाता है. एक मान्यता यह भी है कि छठ पूजा में सबसे पहले नई फसल का प्रसाद चढ़ाया जाता है. इसलिए प्रसाद के रूप में गन्ना फल अर्पण किया जाता है. घाट 4-5 गन्नों को खड़ा कर बांधा जाता है और इसके नीचे दीप जलाये जाते हैं. व्रत करने वाले सारे स्त्री और पुरुष जल में स्नान कर इन डालों को अपने हाथों में उठाकर षष्ठी माता और भगवान सूर्य को अर्ध्य देते हैं. सूर्यास्त के पश्चात सब अपने घर लौट आते हैं. अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में फिर डालों में पकवान, नारियल और फलदान रख नदी के तट पर सारे वर्ती जमा होते हैं और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं. इसके बाद छठ व्रत की कथा सुनी जाती है और कथा के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रती अपना व्रत तोड़ते हैं.

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