करोड़ों की संपत्ति छोड़कर परिवार ने लिया संन्यास, 6 सदस्यों ने एक साथ ली दीक्षा

Ruchi Sharma, Last updated: Fri, 28th Jan 2022, 11:06 AM IST
  • छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में रहने वाले एक परिवार ने अपनी करोड़ों की संपत्ति को दान कर दीक्षा ले ली है. करोड़ों की प्रॉपर्टी, सुख संपत्ति और आराम का जीवन त्यागकर परिवार संयम के पथ पर चल पड़ा है. सांसारिक मोहमाया को छोड़कर डाकलिया परिवार के सभी छह सदस्यों ने एक साथ दीक्षा ली.
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में रहने वाले एक परिवार ने अपनी करोड़ों की संपत्ति को दान कर दीक्षा ले ली

रायपुर. छत्तीसगढ़ में रहने वाला एक परिवार चर्चा का विषय बना हुआ है. जहां एक तरफ लोगों में पैसा कमाने की होड़ लगी है तो वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में रहने वाले एक परिवार ने अपनी करोड़ों की संपत्ति को दान कर दीक्षा ले ली है. करोड़ों की प्रॉपर्टी, सुख संपत्ति और आराम का जीवन त्यागकर परिवार संयम के पथ पर चल पड़ा है. सांसारिक मोहमाया को छोड़कर डाकलिया परिवार के सभी छह सदस्यों ने एक साथ दीक्षा ली. परिवार के सभी सदस्यों ने एक साथ शहर के जैन बगीचे में आयोजित दीक्षा समारोह में करोड़ों की दौलत से मुंह फेर अध्यात्म के रास्ते पर चलने का फैसला किया है.

जानकारी के मुताबिक पूरा कार्यक्रम राजनांदगांव शहर के स्थानी जैन बगीचा में श्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वरजी की उपस्थिति में हुआ है. परिवार ने पांच दिवसीय दीक्षा समारोह में डाकलिया परिवार ने दीक्षा ग्रहण की. डाकलिया परिवार के भूपेंद्र डाकलिया,उनकी पत्नी सपना डाकलिया, बेटी महिमा डाकलिया, मुक्ता डाकलिया, बेटे देवेंद्र डाकलिया और हर्षित डाकलिया ने संयम और अध्यात्म के मार्ग पर चलने की दीक्षा ली.

 

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अपनी इच्छा से चुना ये रास्ता

खास बात यह थी कि इस दीक्षा समारोह में काफी संख्या में लोग मौजूद रहे. परिवार के सदस्यों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हम किसी मजबूरी में नहीं ले रहे, बल्कि अपनी इच्छा से अध्यात्म के रास्ते को अपना रहे हैं. उन्होंने कहा कि दीक्षा का मार्ग सत्य और ईश्वर का मार्ग है, इसलिए उन्होंने इस मार्ग पर चलने का फैसला किया है.

अपने हाथों से नोचने पड़ते हैं बाल

जानकारी के मुताबिक श्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वरजी की मौजूदगी में दीक्षा लेने के बाद ये सभी लोग साधु-साध्वी बनकर समाज में धर्म का प्रचार करेंगे. बता दें कि जैन धर्म में दीक्षा लेने के बाद सभी तरह की सुख-सुविधाओं का त्याग करना होता है. जैन धर्म में इसे ‘चरित्र’ या ‘महानिभिश्रमण’ भी कहते हैं. पांच दिनों तक चलने वाली इस प्रक्रिया का आखिरी चरण पूरा करने के लिए सभी साधुओं और साध्वियों को अपने बाल अपने ही हाथों से नोचकर सिर से अलग करने पड़ते हैं.

कहा- इच्छाएं अनंत होती है

परिजनों ने कहा कि संपत्ति की भी कोई कमी नहीं थी. हम हर इच्छा के पीछे दौड़ते हैं. मगर इच्छाएं अनंत होती हैं. वहीं, जिनकी कोई इच्छा नहीं होती है, वह गुरु भगवन होते हैं.

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