छत्तीसगढ़: शहीद‌ लागुड़ का 109 साल बाद हुआ दाह संस्कार, अब याद में बनेगा स्मारक

Mithilesh Kumar Patel, Last updated: Fri, 4th Feb 2022, 10:48 PM IST
  • अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शहीद‌ लागुड़ नगेसिया, बिगुड़ व थिथिर उरांव का स्मारक उनकी याद में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के सामरी में बनाया जाएगा. इसके लिए बलरामपुर कलेक्टर ने जमीन भी प्रस्तावित कर दिया है. बता दें कि हाल के दिनों में शहीद लागुड़ के परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार किया है.
109 साल बाद हुआ शहीद‌ लागुड़ नगेसिया का अंतिम संस्कार

रायपुर. अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शहीद‌ लागुड़ नगेसिया, बिगुड़ और थिथिर उरांव का स्मारक उनकी याद में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के सामरी में बनाया जाएगा. इसके लिए बलरामपुर कलेक्टर ने सामरी में ढाई एकड़ जमीन प्रस्तावित कर दिया है. 1913 से सूबे के सरगुजा जिले के अंबिकापुर मुख्यालय स्थित सबसे पुराने स्कूल में रखे शहीद‌ लागुड़ नगेसिया के कंकाल की 109 साल बाद हो रहे अंतिम संस्कार में पहुंचे वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय ने कहा कि लागुड़ नगेसिया, बिगुड़ एवं थिथिर को शहीद का दर्जा दिलाने का प्रयास करेंगे.

इधर 109 साल बाद लागुड़ नगेसिया का अंतिम संस्कार हो गया और उन्हें हिन्दू धर्म के हिसाब से मुक्ति मिल गई. आदिवासी समाज और नगेसिया परिवार को इस बात से काफी संतोष मिला है कि मृत्यु के इतने सालों बाद उनके पूर्वज को पूरे मान-सम्मान और उनके रीतिरिवाज के अनुसार अत्येंष्ठि का मौका मिला. 

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बता दें कि सरगुजा मंडल के बलरामपुर जिलें के अंतर्गत कुसमी (सामरी) नामक ब्लॉक आता है . इसी ब्लॉक के राजेंद्रपुर के रहने वाले शहीद लागुड़ नगेसिया संबंधित जिले के पुदाग गांव में घर-जमाई बनकर रहते थे. तत्कालीन समय में शहीद नगेसिया का झुकाव झारखंड में चल रहे टाना भगत नाम के एक आंदोलनकारी के शहीद होने के बाद टाना आंदोलन से हुआ. 

टाना आंदोलन से परिचित होने के बाद शहीद नगेसिया इसका हिस्सा बन गए. शहीद लागुड़, बिगुड़ और कटाईपारा जमीरपाट के रहने वाले थिथिर उरांव तीनों एक साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करने लगे. आंदोलन के सहयोगियों के साथ मिलकर सभी ने अंग्रेजों के लिए काम करने वाले हर एक शख्स को मार गिराया.

मिली जानकारी के अनुसार, सन् 1912 से लेकर 1913 के बीच में शहीद लागुड़ के आदोंलन में सहयोगी थिथिर उरांव को घुड़सवारी दल के ब्रिटिश आर्मी ने मौत के घाट उतार दिया. और इसी आर्मी दल ने शहीद लागुड़ व बिगुड़ को अपने कब्जे में ले लिया. अंग्रेजों ने इन दोनों आदिवासी समाज के आंदोलनकारियों को पकड़कर बेहद दर्दनाक और कड़ी यातनाएं दी. काफी प्रताड़ित करने के बाद दोनों को खौलते तेल में डालकर मृत्युदंड दे दिया.

अंग्रेजों ने साल 1913 में शहीद लागुड़ नगेसिया के कंकाल को तत्कालीन सरगुजा जिले के अंबिकापुर स्थित एडवर्ड स्कूल और मौजूदा समय के मल्टी परपज स्कूल में विज्ञान के स्टूडेंट को पढ़ाने के नाम पर रखवा दिया था. आदिवासी समाज के लोग शहीद लागुड़ नगेसिया के कंकाल को उनके परिजन को देने की मांग कर रहे थे, ताकि वे उसका अंतिम संस्कार कर सकें. बताया जाता है कि आज भी लागुड़-बिगुड़ की कहानी सरगुजा क्षेत्र में लागुड़ किसान और बिगुड़ बनिया के रूप में मशहूर है.आज भी लोक कहानियों में बार बार उनके वीरता की गाथा सुनाई जाती है.

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