RIMS में विसरा जांच के इंतजार में सालों से धूल फांक रहे तीन हजार से ज्यादा सैंपल

ABHINAV AZAD, Last updated: Sat, 11th Sep 2021, 11:39 AM IST
  • राजेन्द्र इंस्टिचयूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में अभी तीन हजार 94 लोगों का विसरा जांच के इंतजार में बॉटल्स में रखी है. यह आंकड़ा 2010 से 9 सितंबर 2021 तक का है.
(प्रतिकात्मक फोटो)

रांची. राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज राजेन्द्र इंस्टिचयूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में अभी तीन हजार 94 लोगों का विसरा जांच के इंतजार में बॉटल्स में रखी है. यह आंकड़ा 2010 से 9 सितंबर 2021 तक का है. शव का पोस्टमार्टम हो जाने के बाद विसरा कलेक्ट करने की जिम्मेदारी पुलिस विभाग की होती है. पुलिस को विसरा कलेक्शन करने के बाद जांच के लिए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री भेजनी होती है. रांची पुलिस की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2010 से रिम्स में हुए पोस्टमार्टम के बाद जांच के लिए रखे गए कुल विसरा का मात्र 11 प्रतिशत विसरा ही केमिकल और टॉक्सिकोलॉजी एनालिसिस के लिए एफएसएल को भेजा गया.

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2014 में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश दिया था कि जहर से होने वाली हर मौत का विसरा जांच कराना जरूरी है. जिन मामलों में जहर का संदेह है, वैसे शव को पोस्टमार्टम के तुरंत बाद विसरा को एफएसएल को भेजा जाना चाहिए. साथ ही एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विसरा वास्तव में जांच के लिए एफएसएल को भेजा गया या नहीं. एफएसएल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विसरा की जांच के बाद जल्द से जल्द मामले की जांच कर रही एजेंसियों और अदालतों को रिपोर्ट भेजी जाए. इसके बावजूद जांच में लपारवाही बरती जा रही है.

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राजेन्द्र इंस्टिचयूट ऑफ मेडिकल में हर महीने करीब 250-300 पोर्स्टमार्टम किया जाता है. इनमे 10-15 मामले में मौत के लिए जहर के इस्तेमाल का संदेह होता है. इन सभी को विसरा जांच के लिए रखा जाता है. लेकिन पुलिस की लापरवाही के कारण रिम्स के फॉरेंसिक विभाग में स्थिति यह हो गई है रखने की जगह भी कम पड़ने लगी हैं.

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