बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने फसलों को ठंड से बचाने को बनाई लो टनल प्लास्टिक तकनीक

Smart News Team, Last updated: Wed, 13th Jan 2021, 8:16 PM IST
पाली व ठंड के कारण फसलों के होने वाले नुकसान से बचाने के लिए राजधानी रांची के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने लो टनल प्लास्टिक तक नहीं की विकसित की है. इस तकनीक के माध्यम से फसलों को आवश्यक तापमान पर सुरक्षित रखा जा सकता है.
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने फसलों को ठंड से बचाने को बनाई लो टनल प्लास्टिक तकनीक

रांची . बता दें कि ठंड के मौसम में तापमान में गिरावट के चलते आलू सहित अन्य फसलों में पाले का प्रकोप ज्यादा देखने को मिलता है. तापमान में गिरावट के चलते फसल को नुकसान होने की संभावना भी रहती है. किसानों की इसी समस्या को गंभीरता से लेते हुए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियांत्रिकी विभाग के वैज्ञानिक डॉ प्रमोद राय ने बताया कि जाड़े के मौसम में कम तापमान होने और पाला पड़ने से होने वाले नुकसान से फसल को बचाना अब संभव है. उन्होंने बताया कि लो टनल प्लास्टिक तकनीकी फसलों को तापमान में गिरावट के दौरान नुकसान से बचाएगी.उन्होंने बताया कि पौधे के विकास के लिए 10 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान जरूरी है.

सर्दी के मौसम में मिट्टी एवं हवा का तापमान रात में काफी कम हो जाता है. इस कारण सब्जियों के पौधों की देखभाल करना कठिन हो जाता है. इसके लिए विरसा कृषि विश्वविद्यालय ने लो टनल प्लास्टिक तकनीक विकसित की है. यह तकनीक जाड़े के मौसम में कम तापमान और पाला से बचाव में मददगार साबित हो रहा है. उन्होंने बताया कि लो टनल प्लास्टिक तकनीकी छोटे प्रकार का गुफा नुमा घर होता है. इसके अंदर ग्रीन हाउस का प्रभाव दिखता है. सर्दी के मौसम में इस घर का तापमान बाहर की तुलना में ज्यादा होता है. कम ऊंचाई वाले इस गुफा नुमा घर को विभिन्न आवरण में 50 माइक्रोन की प्लास्टिक फिल्म 40 वर्ष वाली क्रीडा रहित जाली और 30 से 50% शेडनेट से निर्मित किया जाता है. इस घर का निर्माण सरिया वास एलडी पाइप आदि से किया जा सकता है.इसकी चौड़ाई 80 सेंटीमीटर मध्य की ऊंचाई 40 सेंटीमीटर तथा दोनों सिरों को मिट्टी में 5 सेंटीमीटर गहराई तक डालते हैं. इस गुफा नुमा घर को 50 माइक्रोमीटर यूवी युक्त प्लास्टिक से ढक कर कम तापमान से होने वाले छती से बचा जा सकता है.

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यह लो टनल प्लास्टिक तकनीकी मिट्टी वह हवा का तापमान प्रकाश की तीव्रता वह हवा की आद्रता को नियंत्रित करता है. इस तकनीक से पानी व खाद की बचत के साथ ही खरपतवार व मिट्टी के तापमान को नियंत्रित किया जाना संभव है.कम लागत के कारण इस तकनीक को अपनाकर किसान सर्दी के मौसम में कम तापमान व पाला पड़ने की स्थिति में फसलों को नुकसान से बचा सकते हैं.

 

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