वाराणसी: धर्म व अध्यात्म की नगरी के तमाम पारंपरिक कार्यक्रमों पर कोरोना का ग्रहण

Smart News Team, Last updated: 14/10/2020 03:04 PM IST
  • रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला हो या भरत मिलाप, बंगाली ड्योढ़ी में चली आ रही दुर्गा पूजा हो या करवाचौथ पर होने वाला नक्कटैया मंचन सब परंपराएं इस बार टूटती नजर आ रही हैं.
अध्यात्म नगरी में कोरोना का कहर

वाराणसी. कोरोना महामारी के चलते इस बार धर्म और अध्यात्म की नगरी वाराणसी में सैकड़ों वर्षों से चलती चली आ रहीं परंपराएं टूटती नजर आ रही हैं. इस बार कोरोना का ऐसा प्रभाव पड़ा कि इमली में होने वाला भरत मिलाप भी ना हो सकेगा और ढाई सौ साल पहले बंगाली ड्योढ़ी से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा में भी इस बार प्रतिमा ना रख औपचारिक कार्यक्रम किये जाने की बात कही जा रही है. इसके अलावा चेतगंज की नक्कटैया लीला पर भी कोरोना संकट के चलते प्रशासन ने अभी तक आयोजन की अनुमति नहीं दी है.

बिना ऑडियो सिस्टम और ओपन थियेटर के लिए पूरे विश्व में मशहूर काशी के रामनगर की रामलीला पर जिला प्रशासन ने कोरोना को देखते हुए पहले ही रोक लगा दी है. कोरोना के चलते 1783 से पहली बार शुरू हुई यह भी परंपरा टूटती लग रही है. लक्खा मेले में गिना जाने वाला काशी के प्रसिद्ध भरत मिलाप कार्यक्रम के बारे में रामलीला समिति के प्रबंधक मुकुंद उपाध्याय ने कहा कि लगभग 475 वर्ष भगवान राम के भक्त मेघा भगत ने यहाँ रामलीला कार्यक्रम की नींव रखी थी. आसपास व दूरदराज के लाखों लोग केवल कुछ समय के भरत मिलाप को देखने के लिए आते हैं. इस बार कोरोना महामारी के चलते इसको सांकेतिक रूप से आयोजित किया जाएगा.

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केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलक राज ने बताया कि 1773 ईसवी के दौरान बंगाली ड्योढ़ी में सबसे पहले कोलकाता के आनंद मित्र ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. इस बार भीड़ न हो, इसकी वजह से मूर्ति स्थापित न करके कलश स्थापना कर पूजन किया जाएगा. काशी में करवा चौथ के दिन होने वाली नक्कटैया लीला में भी एक लाख से ज्यादा की भीड़ होती है पर इस बार इस लीला पर भी कोरोना का ग्रहण लगता दिख रहा है.

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