400 से अधिक साल बाद हुआ जनपदोध्वंस रक्षा अभिषेक, कोरोना से बचाव के लिए अनुष्ठान

Smart News Team, Last updated: Mon, 24th May 2021, 2:24 PM IST
  • कोरोना महामारी से बचाव के लिए वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर सोमवार को चार सौ साल बाद जपदोध्वंस रक्षा अभिषेक का यज्ञ किया गया. ऐसा माना जाता है कि इससे पहले या पूजा गोस्वामी तुलसीदास के समय प्लेग महामारी के वक्त किया गया था.
कोरोना महामारी से रक्षा के लिए 400 से अधिक वर्षों बाद हुआ जनपदोध्वंस रक्षा अभिषेक (फाइल फोटो)

वाराणसी. कोरोना महामारी से रक्षा के लिए वाराणसी के तीर्थ दशाश्वमेध घाट पर जनपदोध्वंस रक्षा अभिषेक का दुर्लभ अभिषेक अनादि किया गया. यह अनुष्ठान इससे पहले गोस्वामी तुलसीदास के समय में काली मौत यानी प्लेग महामारी के दौरान किया गया था. जिसे अब 400 से अधिक वर्षों बाद इस वैश्विक महामारी के कारण आयोजित किया गया है. इस अनुष्ठान को काशी के पांच वैदिक विद्वानों के मार्ग दर्शन में 12 ब्राम्हणों के माध्यम से संपादित किया गया. अनुष्ठान स्थल को कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सेनेटाइज भी किया गया.

महामारी से रक्षा के लिए किए गए इस अनुष्ठान में पार्थिव शिवलिंगों में 12 ज्योतिर्लिंगों का आह्वान किया गया. जिनका अभिषेक 12 पवित्र नदियों के जल से किया गया. जिनमें गंगा, यमुना, सरस्वती, कृष्णा, ताप्ति, नर्मदा, शिप्रा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, गोदावरी एवं अलकनंदा नदी शामिल है. इन नदियों के जल में आचार्य चरक द्वारा वर्णित 12 प्रधान औषधियों को मिश्रण किया गया. ये प्रधान औषधियां सुगंधवाला, सुगंध कोकिल, जटामांसी, नागरमोथा, कपुरकारी, अगर तगर, चंपावती, रूद्रवती, कमल पलास, सालम पंजा, नागकेसर एवं शिवलिंगी है.

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यह अनुष्ठान बाबा विश्वनाथ के सानिध्य में हुआ. जिसमें बाबा के प्रतीक स्वरूप उनकी पंचबदन प्रतिमा और रजत दंड को प्रतिष्ठित किया गया. काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत डा. कुलपति तिवारी ने अनुष्ठान में पूजन के बाद द्वादश ज्योतिर्लिंगों का अभिषेक किया. अभिषेक पूरा होने के बाद 12 प्रधान औषधियां और 125 औषधियों से हवन किया गया.

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अनुष्ठान आचार्य महंत पं. दिनेश अंबाशंकर उपाध्याय ने बताया कि जनपदोध्वंस रक्षा अभिषेक मुख्यत महामारी से रक्षा के लिए किया जाता है. इस अभिषेक में पार्थिव शिवलिंग का विशिष्ट महत्व है. जल्द फल प्राप्त करने की कामना से पार्थिवेश्वर शिवलिंग के पूजन का विस्तृत वर्णन शिव महापुराण में किया गया है. महामारी से रक्षा के लिए औषधीय हवन का विधान है. हवन कुंड में औषधियों के जलने से उसका प्रभाव वातावरण में दूर तक विस्तारित हो जाता है.

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