गंगा-वरुणा नदी में समा रही 477 साल पुरानी 'लंका', कटाई के कारण खत्म होने के कगार पर बरसों पुराना रामलीला स्थल

Pallawi Kumari, Last updated: Fri, 1st Oct 2021, 9:53 AM IST
  • काशी में होने वाली रामलीलाओं में सबसे पुरानी श्रीआदि रामलीला लाटभैरव 477 साल पुरानी है. लेकिन लगातार हो रही कटाई के कारण इसका अस्तिव खतरें में हैं. इस रामलीला के लंका मैदान का 40 फीसदी हिस्सा कटान के कारण नदी में समा गया. कहा जाता है कि कभी इन्ही पेंड़ों के नीचे रामायणी दल बैठा करते थे.
नदी में समा रही 477 साल पुरानी लंका मैदान.

वाराणसी. काशी में सालों से कई रामलीलाएं चली आ रही है. इन्हीं में से एक है सालों पुराना श्रीआदि रामलीला लाटभैरव. कहा जाता है कि ये दुनिया का सबसे पुराना रामलीला मैदान है जोकि 477 साल पुराना है. ये रामलीला स्थल गंगा-वरुणा नदी संगम के उत्तरी छोर पर है. लेकिन गंगा-वरुणा नदी की बाढ़ के कारण इसका अस्तिव खबरे में हैं. दरअसल बरसों पुराना काशी का ये रामलीला स्थल लगातार हो रही कटाई के कारण नदी में समा रहा है. बीते करीब दो दशक में इस रामलीला मैदान का लगभग 40 फीसदी हिस्सा कटाई के कारण वरुणा नदी में समा गया.

कटान की वजह से पेड़ों की जड़े जमीन से बाहर आ गई हैं. मैदान में आम, पीपल, चिलबिला, बेल, अशोक, शीशम और सहजन के कई पेड़ थे. लेकिन कटाई के कारण सभी का अस्तिव खत्म हो गया है. वहीं कुछ बचे हुए पेड़ अपना अस्तिव बचाने के लिए जूझ रहे हैं. कहा जाता है कि कभी इन्ही पेड़ों के नीचे रामायणी दल बैठा करते थे.

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पेड़ों की लगातार हो रही कटाई को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि, जल्द ही इन्हें समय रहते संरक्षित नहीं किया गया तो इन पेड़ों की छांव भी लंका मैदान से खत्म हो जाएगी.

1999 में कटान के कारण गिरा था रावण का सिंहासन- इस रामलीला समिति के प्रधान कन्हैया लाल यादव ने बताया कि, रामलीला स्थल पर जहां रावन का सिंहासन लगता था वो हिस्सा 1999 में कटान के कारण गिर गया. हालांकि बाद में नया सिंहासन फिर से बनाया गया.

समाधि पर भी मंडरा रहा खतरा-समिति के प्रधान कन्हैया लाल यादव ने बताया कि मैदान में स्वामी भक्तानंद और दो महिला संतो की समाधियां भी हैं. लेकिन पूरब से कटान बढ़ने के कारण इनपर भी खतरा बना हुआ है.

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