वाराणसी : काशी विद्यापीठ के 100 साल पूरे होने पर याद किए गए आचार्य बीरबल

Smart News Team, Last updated: Fri, 5th Feb 2021, 1:25 PM IST
  • काशी विद्यापीठ स्थापना के 100 साल पूरे होने पर विद्यापीठ ने अपने प्रथम कुलपति आचार्य बीरबल सिंह को याद किया. इस मौके पर मुश्किल के समय में काशी विद्यापीठ को उबारने में उनके योगदान की सराहना की गई.
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ

वाराणसी : आचार्य बीरबल का जन्म 1 जनवरी 18 सो 99 में जौनपुर के जिले कोइआरी गांव में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई. उन्होंने चंदवक बाजार स्थित मिडिल स्कूल से कक्षा 8 तक की पढ़ाई पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए वह वाराणसी आ गए. यहां उन्होंने हीवेट क्षत्रिय कॉलेज जो कि अब यूपी कॉलेज के नाम से जाना जाता है, से हाई स्कूल व इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की. क्वींस कॉलेज से स्नातक तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से साल 1921 में हिस्ट्री से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की. उसी समय असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई. महात्मा गांधी के आवाहन पर ब्रिटिश सरकार के द्वारा संचालित अंग्रेजी पद्धति के स्कूलों का बहिष्कार किया गया.महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आचार्य बीरबल बीएचयू छोड़कर विद्यापीठ आ गए और इतिहास विभाग में बतौर प्राध्यापक नियुक्त हुए. 

महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय होकर भाग लिया. इसी सक्रियता के कारण उन्हें अपने जीवन में चार बार जेल भी जाना पड़ा. पहली बार वे साल 1930 तथा दूसरी बार 1932 में जेल गए. प्रोफेसर बीरबल सिंह संता आंदोलन के प्रति सक्रियता को देखते हुए महात्मा गांधी जी ने उन्हें साल 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन मैं प्रदेश का डिक्टेटर बना दिया. वाराणसी में भूमिगत कार्यक्रम एवं प्रदेश व्यापी क्रियाकलाप उनके निर्देशन में चला करते थे. 9 अगस्त सन 1942 को पुलिस ने विद्यापीठ को चारों ओर से घेर लिया. ब्रिटिश पुलिस ने विद्यापीठ के कई अध्यापकों व विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर लिया. आचार्य बीरबल भी गिरफ्तार हुए. उन्हें 2 साल तक जेल में रहना पड़ा. साल 1963 में विद्यापीठ को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला और वह इस विद्यापीठ के पहले कुलपति बने. उस दौर में कुलपति को उपकुलपति कहा जाता था. 

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साल 1967 में वह कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुए. सेवानिवृत्त होने के बाद भी वह काशी विद्यापीठ परिसर में ही रहा करते थे. आचार्य बीरबल सिंह की पौत्री एवं महिला महाविद्यालय बीएचयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रीता सिंह ने बताया कि आचार्य बीरबल बीएचयू छोड़कर विद्यापीठ आने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे. उन्होंने बताया कि वह अपने जीवन काल में दो बार जौनपुर के सांसद भी रहे. बताया कि उनका 14 दिसंबर 1999 को दिल्ली में हुआ था. वह जीवन की अंतिम सास तक कांग्रेसी रहे.

 

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