बढ़ गई ठंड, नहीं हो सकी परिंदों की जंग

Smart News Team, Last updated: Fri, 15th Jan 2021, 2:25 PM IST
सदियों से परिंदों की जंग लोकप्रिय और मनोरंजन का साधन रही है. पूर्वांचल के क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही परिंदों की जंग अब परंपरा का रूप ले चुकी है. हालांकि सरकार के द्वारा खूनी जंग को कानून के दायरे में समेट लेने के बाद से लोग चोरी छुपे इस मनोरंजन का शौक पूरा कर रहे हैं.
बढ़ गई ठंड, नहीं हो सकी परिंदों की जंग

वाराणसी . मकर संक्रांति का पर्व सूर्य की उपासना के साथ ही सूर्य के उत्तरायण होने का लोक आस्था ही नहीं बल्कि लोक परंपरा का पर्व भी माना जाता है. इसी पर्व पर पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में परिंदों की आपस में जंग का आयोजन भी इसी परंपरा के अंतर्गत माना जाता है. सदियों से लोग इस परंपरा को निभाते चले आए हैं. पहले यह परंपरा खुलेआम हुआ करती थी लेकिन जब से इसको कानून के शिकंजे में कस आ गया है तब से परिंदों के जंग के आयोजन में कमी आई है लेकिन आज भी चोरी छुपे इनके आयोजन होते रहते हैं. तीतर हो या बटेर मुर्गा हो या बुलबुल परिंदों की खूनी जंग में लोग अपना मनोरंजन का साधन तलाशते हैं.

पूर्वांचल के कई जिलों में बुलबुलों को पकड़कर परिंदों के जंग के शौकीनों को बेचा जाता है. अच्छा खाना देकर उनकी सेहत बढ़ाकर उन्हें मकर संक्रांति के पर्व के समय अखाड़े में उतारा जाता है. जंग के मैदान में परिंदे एक दूसरे को लहूलुहान करने को जोर आजमाइश करते हैं. दो गुटों में बटे लोग उनकी जंग पर चटकारे लगाकर ठिठोली करते हैं. जंग जीतने वाले बुलबुल के पालक को इनाम भी दिया जाता है. वहीं विजेता परिंदे को इनाम के तौर पर रिहाई मिलती है. किंतु इस बार मकर संक्रांति के पर्व पर पड़ रही कड़ाके की ठंड और बर्फीली हवा के संग गलन ने परिंदों की जंग को ठंडी बर्फ की चादर में ढक दिया है. सर्दी के चलते इस बार पूर्वांचल के क्षेत्र में परिंदों की जंग का आयोजन नहीं हो पा रहा है.

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जौनपुर जिले के चौकिया धाम निवासी त्रिलोकीनाथ माली ने भी जंग के लिए बुलबुल पाल रखी है. उनका कहना है कि करीब दर्जनभर बुलबुल उनके आंगन में दाना चुगती हैं. इस बार तापमान में गिरावट और शीतलहर के चलते परिंदों का दंगल नहीं हुआ है. इसको लेकर दंगल प्रेमियों में निराशा भी है.

 

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