मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की आग कभी ठंडी नहीं होती, भगवान शिव ने दिया ऐसा वरदान..

Smart News Team, Last updated: Mon, 5th Jul 2021, 12:28 AM IST
  • मान्यता है कि भगवान विष्णु ने मां पावर्ती के स्नान के लिए यहां पर घाट का निर्माण किया था. जब माता पावर्ती कुंड में स्नान कर रही थीं तो उनका एक कर्ण फूल पानी में गिर गया जिसे महादेव ने ढूंढ कर निकाला था.
इस घाट को भगवान शिव ने अनंत शांति का वरदान दिया था. यहां पर हर दिन 200-300 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है. (Credit: Varanasi Official Site)

धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से वाराणसी शहर बेहद ही महत्वपूर्ण है. काशी के 84 घाटों में सबसे चर्चित एक घाट का नाम मणिकर्णिका है. इस घाट को लेकर मान्यता है कि यहां पर जिस भी व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है, उसकी आत्मा को जीवन-चक्र से सदैव के लिए मुक्ति मिला जाती है. हिंदु धर्म में इस घाट को अंतिम संस्कार के लिए सबसे पवित्र माना गया है. यहां पर भगवान शिव और मां दुर्गा का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिससे कई कथाएं जुड़ी हुई हैं.

हर दिन होता है 200-300 शवों का अंतिम सस्कार: वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की आग कभी ठंडी नहीं होती. इस घाट को भगवान शिव ने अनंत शांति का वरदान दिया था. यहां पर हर दिन 200-300 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है. मान्यता है कि इसी घाट पर आकर लोगों को जीवन की असलियत के बारे में पता चलता है.

'मणिकर्णिका घटा' से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने हजारों वर्षों तक इस स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी. (Credit: Varanasi Official Site)

भगवान विष्णु ने अपने 'सुदर्शन चक्र' से किया था घाट का निर्माण: 'मणिकर्णिका घटा' से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने हजारों वर्षों तक इस स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी. इस दौरान उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से यहां पर एक कुंड का भी निर्माण किया. भगवान शिव ने जब मां पावर्ती समेत विष्णु जी को दर्शन दिए तो विष्णुजी ने यह वरदान मांगा की सृष्टि के विनाश के समय भी काशी नष्ट ना हो. शिव जी ने प्रसन्न होकर विष्णुजी को यह वरदान दे दिया. तभी से मान्यता है कि यहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है.

शिव जी ने प्रसन्न होकर विष्णुजी को यह वरदान दे दिया. तभी से मान्यता है कि यहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है. (Credit: Varanasi Official Site)

घाट का नाम पड़ने से भी जुड़ी से एक कथा: मान्यता है कि भगवान विष्णु ने मां पावर्ती के स्नान के लिए यहां पर घाट का निर्माण किया था. जब माता पावर्ती कुंड में स्नान कर रही थीं तो उनका एक कर्ण फूल पानी में गिर गया. जिसे महादेव ने ढूंढ कर निकाला था. देवी पावर्ती के कर्णफूल के नाम पर इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा.

दिल्ली से वाराणसी की दूरी: दिल्ली से वाराणसी करीब 863 किलोमीटर दूर है. आप हवाई मार्ग/ सड़क/रेल मार्ग तीनों से आसानी से वाराणसी जा सकते हैं. अगर आप फ्लाइट से जाते हैं तो 1.25 घंटे में आप वाराणसी शहर पहुंच सकते हैं. वहीं, अगर आप रेल मार्ग के जरिए सफर तय कर रहे हैं तो इसमें आपको 14 घंटे का समय लगेगा. अगर आप सड़क मार्ग से जाते हैं तो इसमें 12.32 घंटे लगते हैं.

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