दो सितंबर से पितृपक्ष शुरू, इस साल श्राद्ध पक्ष में ग्रह गोचरों का खास संयोग

Smart News Team, Last updated: 27/08/2020 12:49 PM IST
  • हिंदुओं का पवित्र पितृपक्ष 2 सितंबर से शुरू होने वाला है. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं. 15 दिन चलने वाले इस पितृपक्ष में तर्पण करने से देव ऋषि और पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है. इसके अलावा यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है तो उसका भी निवारण हो जाता है.
इस बार 2 सितंबर से पितृपक्ष शुरू होने वाले हैं।

वाराणसी. दो सितंबर से श्राद्ध शुरू होने वाले हैं. हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके तर्पण के लिए याद किया जाता है. श्राद्ध पक्ष में लोगों द्वारा अपने पूर्वजों को 15 दिन की अवधि तक सम्मान दिया जाता है. 15 दिन की इस अवधि को ही श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष कहते हैं.

दरअसल, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से हिंदू धर्म में पितृ पक्ष के श्राद्ध शरू होते हैं. 15 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष के पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया है. इस बार अगस्त्य तर्पण के साथ इस बार पितरों का तर्पण भी पहले दिन से ही प्रारंभ हो जाएगा. इसके साथ 15 दिनों के बाद आश्विन मास की अमावस्या पितृ पक्ष का समापन होगा। जो इस बार 17 सितंबर को है.

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15 दिनों के इस पखवाड़े के दौरान श्रद्धालु अपने पितरों को याद करते हुए घरों पर और गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों के किनारे श्राद्ध तर्पण करते हैं. हालांकि यह भी कहा जाता है कि सनातन धर्म को मानने वाले जो तर्पण के अधिकारी हैं उनको साल भर रोज देवता,ऋषि और पितरों को तर्पण करना चाहिए. यदि ऐसा संभव ना हो सके तो कम से कम पितृपक्ष में तो अवश्य तर्पण, अन्नदान और पार्वण श्राद्ध करना चाहिए. हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि तर्पण करने से देव ऋषि और वितरण से मुक्ति मिलती है. साथ ही जन्म कुंडली के पित्र दोष का निवारण भी होता है.

ज्योतिषाचार्य पं. विप्रेंद्र झा माधव ने बताया कि परम्परा के अनुसार पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह, मातामही प्रमातामही, वृद्ध प्रमातामही के अलावा स्वर्गवासी हुए सगे संबंधियों को गोत्र और नाम लेकर तर्पण करना चाहिए. तर्पण के बाद ऊं देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च, नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए. ऐसा करने से देव ऋषि तथा पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है. यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में पितृ दोष हो तो उसका भी निवारण होता है.

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पं. माधव के ने यह भी बताया कि पितृपक्ष के दौरान जिस तिथि को जिन पूर्वजों की मृत्यु हुई हो उस दिन लोगों को उनके नाम का ब्राह्मण भोज कराना चाहिए. यदि किसी को अपने पूर्वज की तिथि पता नहीं मालूम है तो मातृनवमी को स्त्री वर्ग के निमित्त तथा अमावस्या के दिन पुरुष वर्ग के निमित्त ब्राह्मण भोजन कराने का विधान है. इस साल 11 सितंबर को मातृनवमी है और 17 सितंबर को अमावस्या है. पं. माधव के अनुसार शास्त्रों में पितृपक्ष में लोग अपने पुर्वज की पुण्यतिथि के दिन और अमावस्या तिथि को पितर लोग वायु रूप में घर के दरवाजे पर आकर सुबह से शाम तक इन्तजार करते हैं. अपने पुत्रों या वंशजों की ओर से तर्पण आदि नहीं करने से पुर्वज भूखे होने के कारण नाराज़ होकर अपने लोक को लौट जाते हैं. यहां पर एक बात और ध्यान देने वाली है पितर केवल अपनों के द्वारा कराए गए पिंडदान तथा तर्पण से ही तृप्त होते हैं.

इसके अलावा ज्योतिषाचार्य पीके युग का कहना है कि लोगों को सुबह जल्दी नहाने के बाद काला तिल और गंगाजल या जल से पितरों का तर्पण करना होगा. इसके अतिरिक्त केवल दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके ही तर्पण किया जायेगा. पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान करने का खास महत्व है. इस दौरान श्रीमद्भागवत पाठ,गीता व गजेंद्र मोक्ष का पाठ भी किया जाना चाहिए.

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ज्योतिषी युग के अनुसार इस बार पितृपक्ष के दौरान ग्रह -गोचरों का खास संयोग बन रहा है. इस एक पखवारे के दौरान सात सर्वार्थ सिद्धि योग,पांच सिद्धियोग, सात अमृत योग का संयोग भी बन रहा है. साथ ही 13 सितंबर को रवि पुष्य योग भी बनेगा. इस दौरान मंगल,गुरु,शनि और सूर्य अपने अपने स्वगृही स्थानों पर रहेंगे.

इस प्रकार इस बार 2 सितम्बर को महालयारंभ, अगस्त्य मुनि तर्पण, पितृपक्षीय,तर्पणारंभ,10 सितम्बर को जीमूतवाहन व्रत,11 सितम्बर को मातृनवमी, 17 सितम्बर को पितृपक्षांत, महालया और 17 सितम्बर की शाम से मलमास आरंभ हो जाएगा.

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