साहित्य जगत में रामधारी सिंह दिनकर के समतुल्य थे साहित्यकार जानकी बल्लभ शास्त्री

Smart News Team, Last updated: Fri, 5th Feb 2021, 2:54 PM IST
  • महान रचनाकार एवं हिंदी गीत व साहित्य के सम्राट जानकी बल्लभ शास्त्री को अपने समकालीन समय में रामधारी सिंह दिनकर के बराबर माना जाता रहा है. साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने उन्हें दिनकर के मुकाबले खड़ा करने में महती भूमिका निभाई थी.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

वाराणसी : बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्री प्रकाश शुक्ला ने जानकी वल्लभ शास्त्री और सूर्यकांत त्रिपाठी के बीच हुए पत्राचार का अध्ययन करके बताया कि उस जमाने में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री की उपाधि प्राप्त करने में लोग अपने जीवन के 36 बरस पार कर जाते थे लेकिन जानकी बल्लभ शास्त्री ने 18 वर्ष की आयु में ही बीएचयू में संस्कृत विभाग से आचार्य की उपाधि ले ली थी. उन्होंने बताया कि महान साहित्यकार जानकी वल्लभ शास्त्री का जन्म 5 फरवरी 1916 को बिहार राज्य के गया में हुआ था. 

बिहार के मुजफ्फरपुर गरीबी में अपने जीवन की शुरुआत करने वाले जानकी बल्लभ शास्त्री मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से आचार्य की उपाधि हासिल की. साल 1935 में संस्कृत भाषा में कातिली नाम से शास्त्री जी की कविता संग्रह का प्रकाशन हुआ. इसी के साथ हिंदी वाह संस्कृत साहित्य में जानकी वल्लभ शास्त्री का उदय हुआ. उनकी कविताओं में रामधारी सिंह दिनकर कि साहित्य शैली का अंश समावेश हुआ करता था. इस कारण साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जानकी वल्लभ को दिनकर के बराबर का कवि मानते थे. इसके लिए साल 1936 में निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री को एक पत्र लिखकर कहा था कि आप बिहार के कवियों में दिनकर के समकक्ष ठहरते हैं. 

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पत्र के माध्यम से निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री को यह भी कहा था कि मैं तुमको दिनकर के मुकाबले खड़ा करूंगा और देखता हूं कि तुम्हें कौन रोक सकता है. निराला नहीं शास्त्री जी को संस्कृत के साथ हिंदी में कविता रचने के लिए प्रेरित किया था.जिसके बाद उन्होंने हिंदी में रूप अरूप नाम से साल 1939 में अपना पहला कविता संग्रह प्रकाशित करवाया. रूप रूप कविता संग्रह के प्रकाशन के बाद मिली सफलता के कारण जानकी वल्लभ लगातार आठ दशक तक हिंदी गीत व साहित्य के सम्राट बढ़कर चमकते रहे.

 

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