आखिरकार बक्से से बाहर निकल ही आई संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की टेलीस्कोप

Smart News Team, Last updated: 12/12/2020 02:30 PM IST
  • पिछले दिनों हिंदुस्तान स्मार्ट पर प्रकाशित खबर का असर हो ही गया. खबर प्रकाशित होने के चंद रोज बाद ही सही आखिरकार संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले 4 दशकों से बक्से में बंद टेलीस्कोप को बाहर निकाल लिया है. 
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले 4 दशकों से बक्से में बंद टेलीस्कोप को बाहर निकाल लिया है

वाराणसी . बता दें कि हिंदुस्तान स्मार्ट लाइव ने गत 5 दिसंबर को 41 साल से बक्से में बंद है संपूर्णानंद विश्वविद्यालय की टेलीस्कोप खबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी. इस खबर का यूनिवर्सिटी प्रशासन पर असर साफ देखा जा रहा है. खबर प्रकाशित होने के सप्ताह भर के अंदर ही संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कवायद शुरू कर आखिरकार चार दशक बाद टेलीस्कोप को बक्से से बाहर न केवल निकाल ली गई है बल्कि खगोलीय वैज्ञानिकों की ओर से इसका परीक्षण भी करा लिया गया है.

बता दें कि साल 1979 में विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर मुरारी लाल शर्मा ने इस टेलीस्कोप को अमेरिका के एमएमआई कारपोरेशन से खरीद खरीदी थी. टेलिस्कोप स्थापित करने के लिए उनकी ही देखरेख में यूनिवर्सिटी कैंपस में वेधशाला का भी निर्माण शुरू करा दिया गया था किंतु इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि टेलीस्कोप खरीद करने के ठीक अगले साल 1990 में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मुरारी लाल शर्मा की मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु के पश्चात यूनिवर्सिटी कैंपस में ज्योतिष शास्त्र के छात्रों के शोध करने में सहायक इस टेलीस्कोप को स्थापित करने का कार्य भी ठंडे बस्ते में चला गया साथ ही टेलिस्कोप को भी एक बक्से में बंद करके रख दिया गया. पिछले 5 दिसंबर को जब हिंदुस्तान स्मार्ट सिटी में 41 साल से बक्से में बंद टेलीस्कोप संबंधी खबर प्रकाशित हुई तो मानो जैसे विश्वविद्यालय प्रशासन नींद से जागा हो.

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इसे खबर का असर ही कहेंगे कि 1 सप्ताह के अंदर ही यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से बक्से में बंद टेलीस्कोप को न केवल बाहर निकाला गया बल्कि खगोलीय विशेषज्ञों से उसका परीक्षण भी कराया गया. दिवंगत ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मुरारी लाल शर्मा के पुत्र एवं विश्वविद्यालय के संपत्ति अधिकारी नवीन कुमार शर्मा बताते हैं कि इस टेलीस्कोप को अमेरिका से खरीदने में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने न केवल स्वीकृति प्रदान की थी बल्कि 20 लाख रुपए का अनुदान भी दिया था. उन्होंने बताया कि टेलिस्कोप मशीन के भारत की जमीन पर आते ही यह कस्टम ड्यूटी के फेर में फंस गई. कस्टम ड्यूटी अदा करने के लिए विश्वविद्यालय के पास पैसे नहीं थे. इस पर उनके पिता और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री भारत सरकार को पत्र भी लिखा गया. तब जाकर प्रधानमंत्री जी ने इस टेलिस्कोप मशीन पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी को माफ करने का फरमान जारी किया.smar

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