Valmiki Jayanti 2021: इस बार 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी वाल्मीकि जयंती, जानें इससे जुड़ा इतिहास

Priya Gupta, Last updated: Wed, 20th Oct 2021, 10:17 AM IST
  • . हिंदू कैलेंडर के अनुसार वाल्मीकि जी का जन्म अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि के दिन हुआ था. इसलिए हर साल साल इस दिन को वाल्मीकि जयंती मनाई जाती है. इस बार 20 अक्टूबर को वाल्मीकि जयंती है.
इस बार 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी वाल्मीकी जयंती

हिंदुओ का सबसे लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी और इसलिए वाल्मीकी जयंती का विशेष महत्व है. वाल्मीकि जयंती केवल वाल्मीकि समाज में ही नहीं बल्कि सभी के लिए बेहद ही अहम है. हिंदू कैलेंडर के अनुसार वाल्मीकि जी का जन्म अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि के दिन हुआ था. इसलिए हर साल साल इस दिन को वाल्मीकि जयंती मनाई जाती है. इस बार 20 अक्टूबर को वाल्मीकि जयंती है.

देशभर के अलग-अलग हिस्सों वाल्मीकि जयंती के दिन सामाजिक और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. कहा जाता है कि वाल्मी​कि का जन्म महर्षि कश्यप और देवी अदिति के 9वें पुत्र और उनकी पत्नी चर्षिणी से हुआ था. कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने ही दुनिया में सबसे पहले श्लोक ​की रचना की थी. वाल्मीकि जी को एक लेकर एक प्रचलित कहानी ये भी है ​कि जब भगवान राम ने माता सीता का त्याग किया था तो माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही निवास किया था.

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कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने ही दुनिया में सबसे पहले श्लोक ​की रचना की थी. वाल्मीकि जी को एक लेकर एक प्रचलित कहानी ये भी है ​कि जब भगवान राम ने माता सीता का त्याग किया था तो माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रममें ही निवास किया था. इसी आश्रम में ही उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था. इसलिए लोगों के बीच वाल्मीकि जयंती का विशेष महत्व है. मान्यता है कि म​हर्षि वाल्मीकि के पास इतनी मजबूत ध्यान शक्ति थी कि वे एक बार ध्यान में लीन हो गए थे और उनके शरीर के ऊपर दीमन में घर बना लिया था और फिर भी उनका ध्यान भंग नहीं हुआ.

म​हर्षि वाल्मीकि को लेकर इतिहास में कई कहानियां प्रचलित हैं और पौराणिक कथाओं के अनुसार वाल्मीकि का नाम रत्नाकर था और वे एक डाकू थे. लेकिन बाद में जब उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ कि वे गलत रास्ते पर हैं तब उन्होंने इस रास्ते को छोड़ धर्म का मार्ग अपनाया था. उन्हें देवर्षि नारद ने राम नाम का जप करने की सलाह दी थी. जिसके बाद वाल्मीकि जी राम नाम में लीन होकर एक तपस्वी बन गए. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ही ब्रह्मा जी ने उन्हें ज्ञान का भंडार दिया और फिर उन्होंने रामायण लिखी. जो कि हिंदू धर्म में आज एक धार्मिक ग्रंथ के तौर पर पूजी और पढ़ी जाती है.

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