वाराणसी : काशी की माटी से दिली लगाओ रखते थे स्वामी विवेकानंद

Smart News Team, Last updated: Sat, 9th Jan 2021, 5:32 PM IST
  • साधु संतों की तपोस्थली कहे जाने वाली काशी से स्वामी विवेकानंद का दिल्ली लगाव था. अपने जीवन काल में काशी की पावन भूमि का पांच बार भ्रमण कर उन्होंने एक प्रभावी आरोग्य सेवा प्रकल्प की स्थापना का श्रीगणेश किया.
साधु संतों की तपोस्थली कहे जाने वाली काशी से स्वामी विवेकानंद का दिल्ली लगाव था

वाराणसी: संत की उपाधि प्राप्त स्वामी विवेकानंद ने 39 साल 5 महीने और 24 दिन के अपने जीवन काल में 24 वर्ष की अवस्था में साल 1887 में पहली बार काशी के भ्रमण पर आए थे. प्राचीन दस्तावेज बताते हैं कि पहले भ्रमण के दौरान विवेकानंद गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे थे. प्रवास के दौरान सिंधिया घाट पर गंगा स्नान के समय उनकी भेंट बंगाल के जागीरदार परिवार के प्रतिनिधि बाबू प्रमद दास से हुई. पहली भेंट में ही दोनों ने मुख से नहीं बल्कि नेत्रों से एक दूसरे को पहचाना और उनसे बात की.

प्रमद दास के अनुरोध पर स्वामी विवेकानंद ने उनके शिवपुर जो कि अब एलटी कॉलेज के रूप में विख्यात है आवास पर मनोरम बगीचा गोपाल लाल विला मैं अपना अस्थाई ठिकाना बनाया. प्रथम प्रवास के दौरान ही दुर्गा मंदिर के दर्शन के लिए गुजरते समय स्वामी जी को बंदरों ने घेर लिया तो वह डर कर भागने लगे. उसी समय मंदिर से आवाज गूंजी रुको द टू और सामना करो, इस आवाज पर स्वामी विवेकानंद बंदरों के झुंड के सामने डट कर खड़े हो गए. स्वामी जी को तन कर खड़ा देख कर बंदर से हम गए और वहां से चले गए. तभी से स्वामी जी ने इस आवाज की गूंज में उपदेश शब्दों को अपना मूल मंत्र बना लिया.

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स्वामी जी के जीवन की खास बात यह भी है कि शिकागो सम्मेलन में हिस्सेदारी लेने का संकल्प संत विवेकानंद ने साल 18 सो 89 में काशी के प्रवास के दौरान गंगा तट पर लिया था. काशी के गंगा घाट पर ही स्वामी जी ने आदर्श उपलब्धि करूंगा यानी देश का नाश कर लेने की शपथ ली थी.

 

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